आज द्रोह की ही संस्कृति की हवा बह रही है हर ओर,
बुद्धिमान संत्रस्त दिख रहे राजा बने हुए है चोर,
काश कहीं से धुँआ उठे अंगार बने एक आग जले,
एक एक दो ग्यारह होकर मिलें राह में साथ चलें,
तिरछी भ्रकुटि आज मानवता की, कर रही इशारा,
उठो जवानों आज वतन की माटी ने ललकारा,
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