Sunday, 15 September 2013


ये हर तरफ जो नफरतों की खेतियाँ, हैं उग रही,
मिसाल स्वर्ग की हैं जो,वे वादियाँ सुलग रहीं,
जबाब जिससे चाहिए, कहीं वो आप तो नहीं,
सवाल कर रही हैं ये, जो चूड़ियाँ सिसक रहीं,

खुली सभा में ये सवाल, उठाना चाहते हैं हम,
वतन में एक नया चमन खिलाना चाहते हैं हम,

उठो कि आज मातृभूमि के सिंगार के लिए,
बढ़ो कि आज देशप्रेम की पुकार के लिए,
चलो कि हौसलों में जान फूँक देगी जिन्दगी,
लडो चमन की खो रही जो,उस बहार के लिए,

कहें वही करें यही, दिखाना चाहते हैं हम,
हाँ जिन्दगी को उसका हक़ दिलाना चाहते हैं हम,
वतन में एक नया चमन खिलाना चाहते हैं हम..

उठो कि आज भी अगर न साथ-साथ चल सके,
न बन के एक समूह मिस्ले कारवाँ में ढल सके,
तो सच है यूँ कि हम नहीं जमाना बोलता है ये,
वे हो गए फ़ना कि जो न वक्त पे सँभल सके,

दीवार ऊँच - नीच की गिराना चाहते हैं हम,
कि अब तमाम फासले मिटाना चाहते है हम,
वतन में एक नया चमन खिलाना चाहते हैं हम,

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