Friday, 27 September 2013

रूप की अर्चना प्रेम की वंदना संग की कल्पना, कौन करता नहीं,
रीत हो गीत हो कोई भी जीत हो,प्रीत बिन मन का ये मौन भरता नहीं,

गुनगुनाओ जो तुम साथ मेरे अगर, राह की मुश्किलें ही सहारा बनें,
बीच मझधार में एक तिनका बनें, फिर हों कश्ती वही फिर किनारा बनें,

आज दो दर्द की भावना मुझको तुम, कल के ख्वाबों की मैं रोशनी तुमको दूँ,
प्यार की अनवरत साधना दो मुझे, आज मैं प्यार की सादगी तुमको दूँ,

हो गई जब जमा मन में पीड़ा अधिक, कण्ठ से खुद ब खुद गीत-गंगा बही,
कौन परिचित नहीं निर्झरी शक्ति से, तो़ड़ जो पत्थरों का कलेजा रही

उम्र के लम्बे पथ में सहारा बनें ,छाँव दें जो तुझे वृक्ष वे रोप दूँ,
तुझको जीवन मिले खूब फूले - फलें हो ये सच मैं तुझे जिन्दगी सौंप दूँ,

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