कुकरम क्या हमीं करते हैं,यही कुकरम तो संसार कर रहा है। सेठजी रोजगार के नाम पर डाका मारते हैं,वकील मेहनताने के नाम पर डाका मारते हैं, पर उन डकैतों के महल खड़े हैं,हवागाडि़यों पर सैर करते-फिरते हैं,पेचवान लगाए मखमली गद्दियों पर पड़े रहते हैं,सब उनका आदर करते हैं।सरकार उन्हें बड़ी-बड़ी पदवियाँ देती है।
काम करने का ढ़ंग है।वह लोग पढ़े-लिखे हैं इसलिए हमसे चतुर हैं।कुकरम भी करते हैं और मौज भी उडाते है।वही पत्थर मंदिर में पुजता है और वही नालियों में लगाया जाता है।
प्रेमचन्द
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