Monday, 16 September 2013

फिर विचारों पर सियासी रंग गहराने लगे,
फिर छतों पर लाल पीले झंडे लहराने लगे,

आज अपनी ही गली से गुजरते में डर लगा,
आज अपने ही शहर के लोग अन्जाने लगे,

जान पाए तब ही, कोई पास में मारा गया,
जब पुलिसवाले उठाकर लाश ले जाने लगे,

हो गई वीरान सड़कें और कर्फ्यू लग गया,
फिर शहर के आसमाँ पर गिद्ध मँड़राने लगे,

रंग पहले इश्तहारों के अभी उतरे नहीं,
फिर फ़सीलों पर नए नारे लिखे जाने लगे,

अन्त में खामोश होकर रह गए अख़बार भी,
साजिशों में रहबरों के नाम जब आने लगे,

(संकलित)

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