Sunday, 15 September 2013

अपनी इनायतों से ये दिल शाद करोगे,
या इस दिले-मासूम को नाशाद करोगे,

कहते हैं,है इलाज नहीं मर्ज-ए-इश्क का,
क्या अपने आँसुओं को यूँ बरबाद करोगे,

होगा वो खुशनसीब कौन जौक-ए-मयकशी,
जिसके पैमा-ए-जीस्त को शादाब करोगे,

तुमको कसम है खुद की, अहले-जफा सुनो,
खिल्वत में हो कभी, क्या मुझे याद करोगे,

शायद तेरी निगाह में मुशरिक हूँ मैं अभी,
हसरत करूँ क्या फर्दा तुम अहबाब करोगे,

मवादा न आए कहीं से शब--ए-फिराक़,
कुरबत की ख़ुदा से क्या मुनाजात करोगे,

हासिल तुम्हें मक्सूम से है हुश्न की दौलत,
जान-ए-हया कौनेन को उश्शाक करोगे,

कह दो मुझे अंजुम कमर मैं शम्श बनूँगा,
क्या मेरे लिए खुद का दिल आकाश करोगे,

हूँ मैं अभी नवेद और सररशार भी बहुत,
सच तुम कहो क्या मेरा दिल आबाद करोगे,

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