एक प्रसंग याद आ रहा है- काकोरी काण्ड का मुकदमा चल रहा था,लम्बी बहस के बाद फैसले का दिन आया ।ठाकुर ऱोशनसिंह का फैसला अँग्रेज जज ने सुनाना शुरू किया।रोशनसिंह के पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा था क्योंकि फैसला अँग्रेजी में था। वे बोले-ई जज का बकर--बकर कर रहा है। पूरे फैसले के बाद जब पता चला कि फाँसी हुई है वे बहुत खुश हुए क्योंकि बाकी साथियों अ्शफाकउल्ला,रामप्रसाद बिस्मिल आदि को फाँसी हो चुकी थी और वे पीछे नहीं रहना चाहते थे।.आजादी के इतने वर्षों बाद भी क्या हम सब देशवासी ठाकुर रोशनसिंह वाले पाले में नहीं खडे हैं क्या, जरा सोचिए-
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