प्रेमचन्द ने कहा था --
देहात उजडते जाते हैं,शहरों की आबादियाँ बढ़ती जातीं हैं...जबकि आदम के बेशुमार बेटे बदबूदार और अँधेरी कोठरियों में जिन्दगी बशर करने के लिए मजबूर हैं...जबकि बड़े-बड़े व्यासायिक नगरों में सतीत्व आवारा और परीशान रोता फिरता है ,जबकि आज मेहनत की रोटी खाने वाले इंसान पूंजीपतियों के गुलाम होते जाते हैं जबकि महज पैसेवाले व्यापारियों के नफे के लिए खूनी लड़ाइयों में कूदने से भी लोग बाज नहीं आते,वैज्ञानिक या आधुनिक प्रगति का कोई अर्थ नहीं है।
देहात उजडते जाते हैं,शहरों की आबादियाँ बढ़ती जातीं हैं...जबकि आदम के बेशुमार बेटे बदबूदार और अँधेरी कोठरियों में जिन्दगी बशर करने के लिए मजबूर हैं...जबकि बड़े-बड़े व्यासायिक नगरों में सतीत्व आवारा और परीशान रोता फिरता है ,जबकि आज मेहनत की रोटी खाने वाले इंसान पूंजीपतियों के गुलाम होते जाते हैं जबकि महज पैसेवाले व्यापारियों के नफे के लिए खूनी लड़ाइयों में कूदने से भी लोग बाज नहीं आते,वैज्ञानिक या आधुनिक प्रगति का कोई अर्थ नहीं है।
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