सावन की फुहारें ठण्डी हों, या सर्द हवाओं का मौसम,
कोई तो कहे क्यों ऐसे में, जलता है बदन मालूम नहीं,
ठुकरा के जमाने की खुशियाँ,आए थे तेरी इस महफिल में,
नादान था दिल दुनियाँ की जिसे,रस्मों का चलन मालूम नहीँ,
कुछ ऐसी बहारें आईं हैं, बदली है फ़िजा इस गुलशन की,
दुनियाँ में खुशी छाई है पर, दिल को है वहम मालूम नहीं,
उम्मीद से भी आगे बढ़कर, कुछ ख्वाब सजाए बैठे हम,
भटके जो कदम टूटा जो भरम,होंगे कहाँ हम मालूम नहीं,
सूनी है नज़र रस्ता वीराँ, मंज़िल के पते का इल्म नहीं,
बढ़ते हैं कदम आगे-आगे, कैसी है लगन मालूम नहीं,
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