बढ़ो कि इसके पहले बाढ़ आँसुओं की ना आ जाए,
बढ़ो कि हिंसा कहीं क्षमा को ही लील नहीं जाए,
रोको हर वो कदम,चाल अब ना कोई ऐसी फेंको,
नहीं आग से आग कभी होती है शान्त सोच देखो,
युद्ध कहीं हो विजय प्रेम की मैदां में हर बार रही,
मैने नहीं इतिहास के हर एक पन्ने ने ये बात कही,
उठो जवानों आज वतन की माटी तुम्हें पुकार रही,
बढ़ो कि हिंसा कहीं क्षमा को ही लील नहीं जाए,
रोको हर वो कदम,चाल अब ना कोई ऐसी फेंको,
नहीं आग से आग कभी होती है शान्त सोच देखो,
युद्ध कहीं हो विजय प्रेम की मैदां में हर बार रही,
मैने नहीं इतिहास के हर एक पन्ने ने ये बात कही,
उठो जवानों आज वतन की माटी तुम्हें पुकार रही,
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