Monday, 16 September 2013

शहर आपका या मूत्रालय
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सुनकर चौंके,बुरा लगा क्या,
मैं कब कहता,ये दिखता है,

जो देखे ,वह ही कहता है,
कहीं कोई भी कोना लेकर,

मूत्र विसर्जित करने लगता,
गधे के पूत यहाँ मत मूतो,

दीवारों पर लिक्खा दिखता,
कहीं न कोई जगह बनाई,

जहाँ कहीं हम हल्के होकर,
जल्दी से बाहर आ जाएं,

पुरुष और महिलाएं सारे,
बड़ी परेशानी में होते,

कई जगह पर जगह नहीं है,
इसीलिए वो बैठ खड़े हो,

ये सब कुछ करने लगते हैं,
अगर कहीं मूत्रालय है भी,

तो वह इतना गन्दा होता,
हम सब उसके बाहर से ही,

होकर खड़े शुरू हो जाते,
ये सब कुछ कितना भद्दा है,

देख बड़ी ही घिन आती है,
पर हम सब इसके आदी हैं,

लेकिन भारत घूम रहा जो,
पहली बार शहर में आया,

देखेगा तो बोलेगा ही --
शहर आपका या मूत्रालय

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