Monday, 16 September 2013

शहर आपका या कूड़ाघर,
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बुरा लगा सुनकर,
तो फिर क्यों-
खाकर पान थूक देते हो,
सिगरेट पीकर उसके टोटे,
बीड़ी पीकर उसके टुकड़े,
केले खाकर छिलके सारे,
टॉफी खाकर उसका रैपर,
किसी हाल में कभी कहीं भी,
जानबूझकर नासमझी में,
फेंक देश में कूड़ा भरते,
माँ का आँचल मैला करते,


यही देश की क्या भक्ती है,
नहीं रही हममें शक्ती है,
जो हम थोड़ी मेहनत करके,
ये कू़ड़ेदानों में डालें,
जो ऐसा करते हैं अक्सर,
उनको रोके उन्हे सुधारें,


घर के सब कमरों को झारा,
दरवाजे पर कूड़ा सारा,
अपने दरवाजे को झारा,
बीच सड़क पर कूड़ा सारा,
जमा कहीं भी कूड़ा पाया,
आग लगाकर उसे जलाया,
करके वातावरण विषैला,
उसको भी गन्दा कर डाला,


चाहे जानवर या पशु- पक्षी,
कितनी साफ -सफाई रखते,
पढ़े-लिखे होकर भी हम सब,
हर पल कितना गन्दा करते,
ध्यान नहीं देते हैं हम सब,
कहता है कोई बूढ़ा ग़र,
देखेगा जो बोलेगा ही,
शहर आपका या कूड़ाघर,

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