Friday, 1 November 2013

किस तरह भयावह दिखता है,सन्नाटा ये कोलाहल का,
परदे के पीछे परदा है ,बोझल सा स्वारथ का,छल का,

हर नज़र भटकटी फिरती है,हर लहर किनारा माँग रही,
विभ्रम में गुमी जवानी भी, अब एक सहारा माँग रही.

अब बात सुनो आँखें खोलो,ये वक्त तुम्हें कुछ कहता है,
सीने में शान्त उदधि के ही बड़वानल सोया रहता है,

दिन नहीं अभी बीते ज्यादह, देखा था जो प्यारा सपना,
जिसकी खातिर वे कष्ट सहे,कुर्बान किया सब कुछ अपना,

पर आह हुआ छल वृक्ष आम्र पर, ये बबूल के काँटे हैं,
कुछ नहीं किया,सुख नहीं दिया पुण्यात्मा को दुख बाँटे हैं.

है वह विचार धूमिल लगता,तस्वीर का रंग भी फीका है,
दे रक्त इसे सींचो, बाक़ी जो कर्ज बड़ा धरती का है,

अब कदम बढ़ा आगे आओ,ये लगी दृष्टि मंज़िल पर है,
जल रहा आज जो धू-धू कर वह नहीं ग़ैर अपना घर है,

चुका बहुत अब नहीं मात्र सरकार बदलना बाकी है,
शोषण अन्याय गरीबी का आधार बदलना साथी है,

हुलसाता अंतर,जो विचार वह प्रान गहन उस रव का है,

ये पान प्रेम आसव का है, ये गान महा विप्लव का है,

Thursday, 17 October 2013

वक्त का है जो धनी उसकी वाह-वाह है,
वक्त के हाथों पिटा,उसका दिल तबाह है,
बोलो क्या करेंगे हम,

उग रही है खेत में,जिनके श्रम की रोशनी,
फिर भिखारियों सी क्यों,उनकी ये हालत बनी,
क्या यूँ ही सहेंगे हम,

सिसकता किसान औ रोता मजूर आज है,
सामने तो लाओ उनको जिनको इनपे नाज़ है,
सिर्फ है नसीब ग़म,

करनी हैं विफल हमें, ऐसी सारी साजिशें,
किस तरह से होंगी ये,तय ये सारी मंज़िलें,
बाँटें हों खुशी या ग़म,

सुबहो-शाम काम है,काम ही से दाम है,
सच तो ये दोस्तो,काम ही से राम है,
काम ज्यादा बात कम,

राज़ है यही जिसे,जिन्दगी में ढ़ाल लें,
जो हमें सुखी करे,बस वही खयाल लें,
आएगा इसी से दम,


जिन्दगी की राह में,ख्वाब जो तूने बुने,
दे आवाज़ इस तरह कि हर कोई उसे सुने,
साथ चल कदम-कदम,

जिन्दगी कुछ ऐसी बन तू,जिसपे दिल को नाज़ हो,
सारी कोशिश हो इसी की, कल से बेहतर आज हो,

रोशनी दे बाँट सबको जल के सूरज की तरह,
ग़म हटें दिल से, सुहानी भोर का आगाज़ हो,

ज़ुल्म की नगरी में हक़ की गूँज, जो पहली उठे,
मुर्दा दिल में जान फूँके, वो तेरी आवाज़ हो,

साए में तलवार के जिस्मों को जीता, क्या किया,
प्यार की महकाए खुश्बू ,दिल पे तेरा राज हो,

कट गिरें जंजीर, दीवारें हमारे बीच की,
फासले दिल के मिटें,ऐसा अजब अंदाज़ हो,

जिन्दगी कुछ ऐसी बन तू,जिसपे दिल को नाज़ हो,
सारी कोशिश हो इसी की, कल से बेहतर आज हो,

जब कभी प्रकृति के निर्मल निश्छल दर्पन में,
अनजान गगन के अंतहीन इस आँगन में,
सूनी रातों में हो विमुग्ध शिशु सा अधीर,
चाँदी सी उज्ज्वल इस धरती के आँचल में,
जब चाँद ह्रदय की प्रेम सुधा बरसाता है,
सच कहूँ मेरा मन अकथ शान्ति पाता है,

जन कोलाहल से दूर प्रीति की घनी छाँव,
हो घृणा ईर्ष्या नहीं न किंचित बैर भाव,
हक़ जहाँ बराबर मिले न हो शोषित कोई,
सब रहें हँस के ये कहें, है मेरा यही गाँव,
जब ऐसा सपना पलकों को सहलाता है,
सच कहूँ मेरा मन अकथ शान्ति पाता है,

Wednesday, 16 October 2013

रावण तुम मरे नहीं
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रावण तुम मरे नहीं,
तुम अभी जिन्दा हो,
मैने सुना है --
तुम्हारा अट्टहास,
फाकाकश तंगहाल इंसानों के ,पेट में,
बलत्कृत अबलाओं की निर्वसन,देह में,
भूख से तड़पते बच्चों के खाली,हाथों में,
जी तोड़ मेहनत के बाद भी,अपने पसीने को,
आँसुओं में बदलते देख मजदूर और किसान की आँखों में,

जुल्मों की इंतहाँ से न निकल पाने वाली आहों में,
मैंने सुना है तुम्हारा अट्टहास,
रावण तुम मरे नहीं,
तुम अभी जिन्दा हो,
रावण...


राम को हमेशा डर लगा है,
समाज से,
मर्यादाओं से,
परम्पराओं से,
नियमों के अनियोजित अनुपालन से,
लेकिन तुम्हें,
तुम्हें कोई भय नहीं,
सारी शक्तियाँ तुम्हारी गुलाम हैं,
तुम्हारी लंका के सोने की चमक ने,
उन्हें अंधा कर दिया है,
तुम्हारा साम्राज्य,
अब लंका की सीमाएं तोड चुका है,
तुम अब पहले से अधिक शक्तिशाली हो रावण,
तुम मरे नहीं,
तुम अभी जिन्दा हो,


यूँ तो हर साल,
तुम्हारा पुतला जलाया जाता है,
और इस तरह,
याद दिलाया जाता है,
कि लोकतंत्र में हमारे पास,
यही एक अन्तिम हथियार है,

जोकि,
सिद्ध हो चुका है,
कि बेकार है रावण,
तुम मरे नहीं,
तुम अभी जिन्दा हो,


कहीं पिछली बार की तरह,
राम को,
वानरों(वन नरों) का सहारा न मिल जाए,
और बिना बात फिर कोई,
मुसीबत न खड़ी हो जाए,तुमने,
तुमने वनों को ही कटवा दिया,
जहाँ से उठ खड़ी हुई थी पहले समस्या,
उसे हटवा दिया,
अब सम्भव है कि,
राम के लिए,
कैकेई को वनवास की जगह,
दूसरी दुनियाँ का वास,
ढूँढ़ना पड़े,
और इस बहाने,
तुम पर आनेवाली आफत,

किसी दूसरी दुनियाँ में टले,

मैंने समझा है,
तुम्हारी दूरदृष्टि को,
रावण,
तुम मरे नहीं,
तुम अभी जिन्दा हो,
मैंने देखा है,
तुम्हारी राजनीति को,
तुम्हें मालूम है,
मनुष्य में विचार शक्ति होती है,
जोकि सृजन के नए सपने बोती है,
तुमने इस समस्या को भी,
सुलझा लिया,
आदमी को बहुत गहरे में,
उलझा दिया,
अब,
अब वह नहीं उबर सकता,
मँहगाई के चंगुल से,
नफरत के जंगल से,
अब नहीं निकल सकता,
रोटी के घेरे से,
ईर्ष्या के फेरे से,
अब वह नहीं बाहर आ सकता,
घर के कुएँ से,
कोल्हू के जुएँ से,
मैंने देखा है,सुना है,समझा है,
रावण,
तुम मरे नहीं,
तुम अभी जिन्दा हो,
सिद्ध हो चुका है,
कि बेकार है रावण,
तुम मरे नहीं,
तुम अभी जिन्दा हो,



काम क्रोध और लोभ का मारा जगत न आया रास,
जब-जब राम ने जनम लिया,तब-तब पाया वनवास,

कलयुग तक चलती आई है सतयुग की यह रीत,
सबकुछ हार चुकें जब अपना तब हो राम की जीत,

जुग बदल पर बदल न पाया अब तक ये इतिहास,
जब-जब राम ने जनम लिया,तब-तब पाया वनवास,

छोड़ के अपने महल-दो-महले जंगल जंगल फिरना,
औरों की सुख-चैन की खातिर दुख संकट में घिरना,

यही है राम के लेख की रेखा आ गया अब विश्वास,
जब-जब राम ने जनम लिया,तब-तब पाया वनवास,

राम हर एक युग में आए पर कौन उन्हें पहचाना,
राम की पूजा की जग ने पर राम का अर्थ न जाना,

तकते-तकते बूढ़े हो गए धरती और आकाश,
जब-जब राम ने जनम लिया तब-तब पाया वनवास,
चुप है धरती चुप हैं चाँद सितारे,
मेरे दिल की धड़कन,तुझको पुकारे,

खोए-खोए से ये मस्त नज़ारे,
ठहरे-ठहरे से ये रंग के धारे,

ढ़ूँढ़ रहे हैं तुझको,साथ हमारे,
चुप है धरती चुप हैं चाँद सितारे,

कोने-कोने मस्ती फैल रही है,
बाँहें बनकर हस्ती फैल रही है,

तुझ बिन डूबे दिल को कौन उभारे,
चुप है धरती चुप हैं चाँद सितारे,

निखरा-निखरा सा है चाँद का जोबन,
बिखरा-बिखरा सा है नूर का दामन,

आ जा मेरी तन्हाई के सहारे,
चुप है धरती चुप हैं चाँद सितारे,