Thursday, 17 October 2013

वक्त का है जो धनी उसकी वाह-वाह है,
वक्त के हाथों पिटा,उसका दिल तबाह है,
बोलो क्या करेंगे हम,

उग रही है खेत में,जिनके श्रम की रोशनी,
फिर भिखारियों सी क्यों,उनकी ये हालत बनी,
क्या यूँ ही सहेंगे हम,

सिसकता किसान औ रोता मजूर आज है,
सामने तो लाओ उनको जिनको इनपे नाज़ है,
सिर्फ है नसीब ग़म,

करनी हैं विफल हमें, ऐसी सारी साजिशें,
किस तरह से होंगी ये,तय ये सारी मंज़िलें,
बाँटें हों खुशी या ग़म,

सुबहो-शाम काम है,काम ही से दाम है,
सच तो ये दोस्तो,काम ही से राम है,
काम ज्यादा बात कम,

राज़ है यही जिसे,जिन्दगी में ढ़ाल लें,
जो हमें सुखी करे,बस वही खयाल लें,
आएगा इसी से दम,


जिन्दगी की राह में,ख्वाब जो तूने बुने,
दे आवाज़ इस तरह कि हर कोई उसे सुने,
साथ चल कदम-कदम,

2 comments:

Sudhir Verma said...

amazing one sir ji

Anonymous said...

good one