जब कभी प्रकृति के निर्मल निश्छल दर्पन में,
अनजान गगन के अंतहीन इस आँगन में,
सूनी रातों में हो विमुग्ध शिशु सा अधीर,
चाँदी सी उज्ज्वल इस धरती के आँचल में,
जब चाँद ह्रदय की प्रेम सुधा बरसाता है,
सच कहूँ मेरा मन अकथ शान्ति पाता है,
जन कोलाहल से दूर प्रीति की घनी छाँव,
हो घृणा ईर्ष्या नहीं न किंचित बैर भाव,
हक़ जहाँ बराबर मिले न हो शोषित कोई,
सब रहें हँस के ये कहें, है मेरा यही गाँव,
जब ऐसा सपना पलकों को सहलाता है,
सच कहूँ मेरा मन अकथ शान्ति पाता है,
अनजान गगन के अंतहीन इस आँगन में,
सूनी रातों में हो विमुग्ध शिशु सा अधीर,
चाँदी सी उज्ज्वल इस धरती के आँचल में,
जब चाँद ह्रदय की प्रेम सुधा बरसाता है,
सच कहूँ मेरा मन अकथ शान्ति पाता है,
जन कोलाहल से दूर प्रीति की घनी छाँव,
हो घृणा ईर्ष्या नहीं न किंचित बैर भाव,
हक़ जहाँ बराबर मिले न हो शोषित कोई,
सब रहें हँस के ये कहें, है मेरा यही गाँव,
जब ऐसा सपना पलकों को सहलाता है,
सच कहूँ मेरा मन अकथ शान्ति पाता है,
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