Wednesday, 16 October 2013

रावण तुम मरे नहीं
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रावण तुम मरे नहीं,
तुम अभी जिन्दा हो,
मैने सुना है --
तुम्हारा अट्टहास,
फाकाकश तंगहाल इंसानों के ,पेट में,
बलत्कृत अबलाओं की निर्वसन,देह में,
भूख से तड़पते बच्चों के खाली,हाथों में,
जी तोड़ मेहनत के बाद भी,अपने पसीने को,
आँसुओं में बदलते देख मजदूर और किसान की आँखों में,

जुल्मों की इंतहाँ से न निकल पाने वाली आहों में,
मैंने सुना है तुम्हारा अट्टहास,
रावण तुम मरे नहीं,
तुम अभी जिन्दा हो,
रावण...


राम को हमेशा डर लगा है,
समाज से,
मर्यादाओं से,
परम्पराओं से,
नियमों के अनियोजित अनुपालन से,
लेकिन तुम्हें,
तुम्हें कोई भय नहीं,
सारी शक्तियाँ तुम्हारी गुलाम हैं,
तुम्हारी लंका के सोने की चमक ने,
उन्हें अंधा कर दिया है,
तुम्हारा साम्राज्य,
अब लंका की सीमाएं तोड चुका है,
तुम अब पहले से अधिक शक्तिशाली हो रावण,
तुम मरे नहीं,
तुम अभी जिन्दा हो,


यूँ तो हर साल,
तुम्हारा पुतला जलाया जाता है,
और इस तरह,
याद दिलाया जाता है,
कि लोकतंत्र में हमारे पास,
यही एक अन्तिम हथियार है,

जोकि,
सिद्ध हो चुका है,
कि बेकार है रावण,
तुम मरे नहीं,
तुम अभी जिन्दा हो,


कहीं पिछली बार की तरह,
राम को,
वानरों(वन नरों) का सहारा न मिल जाए,
और बिना बात फिर कोई,
मुसीबत न खड़ी हो जाए,तुमने,
तुमने वनों को ही कटवा दिया,
जहाँ से उठ खड़ी हुई थी पहले समस्या,
उसे हटवा दिया,
अब सम्भव है कि,
राम के लिए,
कैकेई को वनवास की जगह,
दूसरी दुनियाँ का वास,
ढूँढ़ना पड़े,
और इस बहाने,
तुम पर आनेवाली आफत,

किसी दूसरी दुनियाँ में टले,

मैंने समझा है,
तुम्हारी दूरदृष्टि को,
रावण,
तुम मरे नहीं,
तुम अभी जिन्दा हो,
मैंने देखा है,
तुम्हारी राजनीति को,
तुम्हें मालूम है,
मनुष्य में विचार शक्ति होती है,
जोकि सृजन के नए सपने बोती है,
तुमने इस समस्या को भी,
सुलझा लिया,
आदमी को बहुत गहरे में,
उलझा दिया,
अब,
अब वह नहीं उबर सकता,
मँहगाई के चंगुल से,
नफरत के जंगल से,
अब नहीं निकल सकता,
रोटी के घेरे से,
ईर्ष्या के फेरे से,
अब वह नहीं बाहर आ सकता,
घर के कुएँ से,
कोल्हू के जुएँ से,
मैंने देखा है,सुना है,समझा है,
रावण,
तुम मरे नहीं,
तुम अभी जिन्दा हो,
सिद्ध हो चुका है,
कि बेकार है रावण,
तुम मरे नहीं,
तुम अभी जिन्दा हो,



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