Friday, 11 October 2013

आज अकल है आई
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कौआ एक कहीं से टुकड़ा रोटी का ले आया,
सोचा उसने बैठ डाल पर,जाए इसको खाया,

तभी कहीं से बिल्ली आई,बोली-कौआ मामा,
सुना बुज़ुर्गों से हमने,तुम गाते अच्छा गाना,

अच्छा अब तुम जल्दी से,तारीफ हमारी पाओ,
हम तो माने तब,जब हमको मीठा गीत सुनाओ,

चोंच से पंजे में कौए ने, रोटी तुरत दबाई,
बोला-बिल्ली मौसी हमको,आज अकल है आई,

आज नहीं आसान हमारी मेहनत को यूँ खाना,
बैठो रोटी खा लूँ, फिर मैं तुम्हें सुनाऊँ गाना,

खाना अच्छा नहीं किसी की मेहनत,धोखा देकर,
चल दी यही सोचती बिल्ली अपना सा मुँह लेकर,

सदियों से कौओं की मेहनत रही बिल्लियाँ खाती,
कोई भी गंदी आदत हो, जाते-जाते जाती,

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