Friday, 11 October 2013

पैरों की हड़ताल
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जब ईनाम दौड़ का देने, गरिमा को बुलवाया,
पैरों ने हड़ताल करी,एक कदम न बढ़़ने पाया,

सारे थे हैरान, भला क्यों पैर करें नादानी,
पूछा तो पैरों ने कह दी अपनी राम कहानी,

मैने मेहनत की और दौड़ा पहला नम्बर पाया,
मेहनत जब मेरी ईनाम क्यों हाथों को दिलवाया,

करे उसी को मिले,भला है ये इंसाफ निराला,
मैं तो जाऊँ जब ईनाम हो,मुझको मिलने वाला,

सुनकर पैरों की ये चख-चख पीठ हुसक कर रोई,
बड़े न्याय वाले बनते हो, लाज शरम सब खोई,

कल जब जीभ चटक्खे ले, आमों के बाग गई थी,
रखवाले का लट्ठ पड़ा मुझ पर, ये बात सही थी,

खाया मुँह ने मार पड़ी मुझ पर,क्यों भला बताओ,
आाखिर ये है न्याय कहाँ का भाई मेरे समझाओ,

आपस में अंगों का झगड़ा, सुन शरीर मुसकाया,
मिलजुलकर सब काम करें यदि, सुखी रहेगी काया,

रखवाले को देख, वहाँ से पैर भाग जो जाते,
मुँह को मिलता स्वाद,पीठ पर लट्ठ न पड़ने पाते,

अगर रहें मिलजुलकर हम,तो दुनिया कर लें वश में,
मुट्ठी बंद लाख की, हम जो लड़ें नहीं आपस में,

आई बात समझ में, सबने मिलकर कदम बढ़ाया,
गूँज उठीं तालीं,जब गरिमा ने ईनाम वो पाया,

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