Wednesday, 16 October 2013

इंसाफ का तराजू जब हाथ में उठाए,जुर्मों को ठीक तोले,
ऐसा न हो कि कल का इतिहासकार बोले,
मुज़रिम से भी जियादा, मुन्सिफ ने जुल्म ढ़ाया,
कीं पेश उसके आगे, ग़म की गवाहियाँ भी,
रक्खीं नज़र के आगे, दिल की तबाहियाँ भी,
उसको यकीं न आया, इंसाफ कर न पाया,
और अपने इस अमल से,बदकार मुज़रिमों के,
नापाक हौसलों को, कुछ और भी बढ़ाया,

इंसाफ का तराजू जो हाथ में उठाए,ये बात याद रक्खे,
सब मुंसिफों से ऊपर,एक और भी है मुन्सिफ,
वो दो जहाँ का मालिक सब हाल जानता है,
नेकी के और बदी के अहवाल जानता है,
दुनिया के फैसलों से मायूस जाने वाला,
ऐसा न हो कि उसके दरबार में पुकारे,
ऐसा न हो कि उसके इंसाफ का तराजू ,एक बार फिर से तोले-
मुज़रिम के ज़ुल्म को भी,मुन्सिफ की भूल को भी,
और अपना फैसला दे,वो फैसला कि जिससे हर रूह काँप उट्ठे,

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