Friday, 20 March 2015

कल पुस्तक मेले में हम थे,
पुस्तक थीं और बच्चे थे,

दोस्त दोस्तों के संग संग थे,
वे क्षण कितने अच्छे थे,

वादा है यह अपना खुद से,
आगे भी हम संग रहें,

मजे करें, बातें आपस में,
मिलें जुलें ना बंद रहें,

पढने का आनंद भला,
ना पढने वाले क्या जाने,

जिनका दिल खुश हुआ,
वही मोल वो इनका पहचाने,
ये वतन तेरी मेरी नस्ल की जागीर नहीं,
सैकड़ों नस्लों की मेहनत ने संवारा है इसे,
..पटरियां रेल की, सडकों की बसें, फोन के तार,
तेरी और मेरी खताओं की सजा क्यों भुगतें,
उनपे क्यों जुल्म हो जिनकी कोई तकसीर नहीं,
ये वतन तेरी मेरी नस्ल की जागीर नहीं,
सैकडों नस्लों की मेहनत ने सँवारा है इसे,
साहिर
तकसीर - दोष

Sunday, 26 October 2014

अब की इस दीवाली में,
हम थे नोआखाली में,

बोतल से राकेट चलाए,
चर्खी घूमी थाली में,

खील खिलौने मिलके खाए,
घूमे सब खुशहाली में,

अच्छी बातें मन में रखीं,
गंदी बातें नाली में,

क्या-क्या हुआ बताया हमने,
अब की इस दीवाली में,

Tuesday, 30 September 2014

तोड़ कर घन हाथों से डोर,
चल पड़ी जब तू भू की ओर,
दृष्टि फैलाई चारों ओर,
नहीं था ओर न कोई छोर,

डोलती चली हवा के संग,
उड़ रही जैसे कोई पतंग,
मस्त हो मन नाचे इस ढ़ंग,
नाचता जैसे कोई मलंग,

न थी कुछ रस्ते की पहचान,
न था कुछ पाने का अरमान,
न था तुझको इन सबका ध्यान,
शून्य में विचर रहे थे प्रान,

साथ थी तुझ सी कई अनेक,
भरी थी पानी से हर एक,
खुशनुमा चेहरा मेरा देख,
हो के हैराँ यूँ बोली एक,

किसलिए खुश हो इतना आज,
पा लिया क्या जीवन का राज़,
घोल कानों में मधु आवाज़,
बना लो हमको भी हमराज़,

हँस के छेड़ी जो तूने तान,
सुन के मैं खुद अब तक हैरान,
कहा तेरा लूँ जो मैं मान,
'यही तो जीवन की पहचान',

(रजनीकान्त शुक्ल)
रचनाकाल --10-2-2006

Thursday, 25 September 2014

आसमान में ऊँची उड़ती, है प्यारी चिड़िया,
खूब हमारे मन को भाती, है प्यारी चिड़िया,

रंगबिरंगे पंखों वाले कपड़े यह पहने,
चौकन्नी हर पल है इसकी फुर्ती क्या कहने,

पास नहीं आती मन को, पर बहुत लुभाती है,
संग उड़ें हम इसके , ऐसा मन ललचाती है,

हम भी एक बनाएँगे अब , ऐसी ही चिड़िया,
सुन्दर पंख रंगेंगे जो होंगे , एकदम बढ़िया,

प्यारी नन्ही चिड़िया को, हम मित्र बनाएँगे,
मूर्ति बना कर रंगबिरंगे, चित्र बनाएँगे,

आजा री अब ना जा री तू ओ प्यारी चिड़िया,
मनभाता वो चीं-चीं गाना अब गा री चिड़िया,

Tuesday, 2 September 2014

घूम-घूम कर देख रहे हैं ,
मेले को बच्चे,

संग किताबों के ये,
लगते हैं कितने अच्छे,

दोस्त किताबें सबसे अच्छीं,
सभी बताते हैं,

अगर पढोगे तभी बढोगे,
सब समझाते हैं,

मानी बात बडों की,
आया मज़ा बड़ा हमको,

चेहरे देख बताओ,
कैसा लगता है तुमको,
खूब झमाझम बारिश आयी,मौसम हुआ सुहाना,
घर पर बैठ पकौड़े खाओ,आज कहीं मत जाना,

नहा रहीं पेड़ों की पत्ती, खूबसूरत लगती हैं,
टपक रही पत्तों से बूँदें, झरने सी झरतीं हैं,

छत के नीचे दुबके बैठे, घरवाले, पशु-पक्षी,
शरण यहाँ सबने ले रखी, बच्चे हों या बच्ची,

बारिश में निकलूँ,भीगूँ मैं ऐसा सोच रहा हूँ,
तन से थोड़ा लेकिन मन से पूरा भीग रहा हूँ,

बूँदें तन को सिहरातीं तो मन भी खुश हो जाता,
कभी सोचता आखिर हमने अपनाया क्यों छाता,

कदम रोक कहता मन मुझसे,दुनियादारी सीखूँ,
पागल मन बावरा सोचता, मैं बारिश में भीगूँ,