Friday, 7 October 2016

कभी कभी मन करता मेरा,
मैं ऐसा बन जाऊँ,
खुली हवा में घूमूं ,
मस्ती करूँ उमंग बढाऊँ,
काश कोई ऐसे में साथी,
आए, हो अलबेला,
उसमें डूबूँ , मुझे डुबो ले ,
मैं न रहूँ अकेला,
जग में कोई चीज भी,
कब होती बेकार,
दृष्टि चाहिए दे सकें,
हम उसको आकार,
हम उसको आकार,
सृजन के विचारों से,
बना टोकरीं लीं ये ,
रद्दी अखबारों से,
सोच सही जो,
नहीं कोई कठिनाई मग में,
कचरा भी कर सके
उजाला, सारे जग में,
कितनी सुंदर दुनिया अपनी,
सागर पर्वत सारे,
सन-सन पवन चले मदमाती, 
हँसते छल-छल धारे,
खुशकिस्मत हम पैदा हो जो,
आए इस धरती पर,
तरह-तरह के जीव-जन्तुओं सहित,
हमारा ये घर,
प्रेम लुटाए हाथ बढ़ाए,
साथ रहें मिलजुलकर,
बाहर जो भी दर्शन है,
अंदर का ही दर्पन है,
देते हम जो दुनिया को,
वापस हमको अर्पन है,
आओ ये संकल्प धरें,
मन को मैला नहीं करें,
रंग बिरंगे ये गुब्बारे,
कितने अच्छे कितने प्यारे,
इन्द्रधनुष से रंगरंगीले,
लाल हरे नीले और पीले,
देखूँ तो मन खुश हो जाए,
हाथों में लूँ मन ललचाए,
लगे हाथ ऊपर को जाए,
संग-संग उछलूँ जी में आए,
हुआ जन्मदिन पापा लाए,
संग दोस्त हम सब हर्षाए,
कटा केक तब फोड़े सारे,
रंग बिरंगे ये गुब्बारे,
सागर से उड़ आएं,नभ के आँगन,
बादल से बरसें हम,बूँदों सा छम्म,
मन में हो कैसी भी कोई उलझन,
फूलों पे मुसकाएँ,शबनम से हम,
फौलादी सीने हैं दिल में सरगम,
मरने से पहले, क्यों मर जाएँ हम,
रस्ता न सूझे हो ऐसा विजन,
तब आएँ ले के हम रिमझिम सावन,
खुश क्यों हैं मत पूछो क्या हैं जी हम,
थिरके तन गाए मन ऐसी रिदम,
सतरह से ज्यादा न बारह से कम,
राजा अपने मन के हम हैं जी हम,
पाकिस्तानी कवयित्री फहमीदा रियाज की कविता...
तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
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तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
अब तक कहां छुपे थे भाई?
वह मूरखता, वह घामड़पन
जिसमें हमने सदी गंवाई
आखिर पहुंची द्वार तुम्हारे
अरे बधाई, बहुत बधाई
भूत धरम का नाच रहा है
कायम हिन्दू राज करोगे?
सारे उल्टे काज करोगे?
अपना चमन नाराज करोगे?
तुम भी बैठे करोगे सोचा,
पूरी है वैसी तैयारी,
कौन है हिन्दू कौन नहीं है
तुम भी करोगे फतवे जारी
वहां भी मुश्किल होगा जीना
दांतो आ जाएगा पसीना
जैसे-तैसे कटा करेगी
वहां भी सबकी सांस घुटेगी
माथे पर सिंदूर की रेखा
कुछ भी नहीं पड़ोस से सीखा!
क्या हमने दुर्दशा बनायी
कुछ भी तुमको नज़र न आयी?
भाड़ में जाये शिक्षा-विक्षा,
अब जाहिलपन के गुन गाना,
आगे गड्ढा है यह मत देखो
वापस लाओ गया जमाना
हम जिन पर रोया करते थे
तुम ने भी वह बात अब की है
बहुत मलाल है हमको, लेकिन
हा हा हा हा हो हो ही ही
कल दुख से सोचा करती थी
सोच के बहुत हँसी आज आयी
तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
हम दो कौम नहीं थे भाई
मश्क करो तुम, आ जाएगा
उल्टे पांवों चलते जाना,
दूजा ध्यान न मन में आए
बस पीछे ही नज़र जमाना
एक जाप-सा करते जाओ,
बारम्बार यह ही दोहराओ
कितना वीर महान था भारत!
कैसा आलीशान था भारत!
फिर तुम लोग पहुंच जाओगे
बस परलोक पहुंच जाओगे!
हम तो हैं पहले से वहां पर,
तुम भी समय निकालते रहना,
अब जिस नरक में जाओ, वहां से
चिट्ठी-विट्ठी डालते रहना!