Tuesday, 7 February 2017

यह सोच न लेना कल को दूसरे पहनूँगा,
फैशन के तहत नहीं ओढ़े मैंने विचार,
रग-रग में लहू उबलता, आग मचलती है,
जब कभी सुनाई देती है, शोषित पुकार,
ज्यों चुभे दंश, अनुभूति न सोने देती है,
चाँदनी रात में सौ-सौ ज्वार उठाती है,
तनहाई का यह जहर चाटता है मन को,
मत पूछ, अकेलेपन की पीड़ा, खाती है,
हम ग़मज़दा हैं, लाएं कहां से खुशी के गीत,
देंगे वही जो पाएंगे, इस जिंदगी से हम,
है आज नहीं कुछ हाथों में,
अपने भी नहीं तो ग़म क्यों हो, 

सूरज भी नहीं,चंदा भी नहीं,
तारे भी नहीं,जुगनू भी नहीं,
हम दूत उजाले के,किरनें बन,
अपनी डगर चमकाएंगे,


बादल भी नहीं,सागर भी नहीं,
नदिया भी नहीं,पोखर भी नहीं,
हम बूँद उम्मीद की,पत्तों पर,
मोती सा बिखरता जाएंगे,


तूफां भी नहीं,आंधी भी नहीं,
लूका भी नहीं,झोंका भी नहीं,
हम सांस की चलती डोरी हैं,
मंज़िल पे सफर ले जाएंगे,


है पास नहीं,कुछ परवा नहीं,
अपने भी नहीं तो क्यों ग़म हो,
हिम्मत से जो पत्थर जोड़े हैं,
हम उनसे राह बनाएंगे,

Tuesday, 8 November 2016

धरती मेरी प्यारी धरती,
हम सब का इससे नाता,
हम हैं इसके बेटे जैसे,
सचमुच ये अपनी माता,
इतना सुंदर इसे बनाया,
रखी उठा न कोई कसर,
स्वर्ग नहीं देखा हमने पर,
है ये उससे भी बढ़ कर,
रहम करो इस पर अय लोगो,
इसे न यूँ बरबाद करो,
कहाँ रहोगे खुद, ये सोचो,
इसको फिर आबाद करो,
नहीं पीढ़ियां आने वाली,
माफ करेंगी कहते हैं,
सिर्फ नहीं हम ही धरती पर,
और बहुत से रहते हैं,

Thursday, 3 November 2016

रात अचानक आँख खुली तो,
खिड़की के बाहर देखा,

खूब रोशनी बिखर रही थी,
सोचा बल्ब खुला छोड़ा,


आया बाहर धवल चाँदनी,
पसरी हुई सकल भू पर,


अप्रतिम था सौंदर्य खज़ाना,
खुला हुआ नीचे-ऊपर,
भीड़ जुटी है, अपने चारो ओर प्रिये,
नहीं दिखाई देता है, कुछ और प्रिये,
सब थे सबकुछ हम ना कुछ थे ऐसा भी,
गुजर चुका है इस जीवन में, दौर प्रिये,
वक्त एक सा कब रहता इस जीवन में,
सिर पर कभी नदी में जाता, मौर प्रिये,
करें उपासा नौ दिन या नौ महिनों का,
मुँह से बड़ा न मुँह में जाता कौर प्रिये,
थोड़ा लिखा, समझना ज्यादा इसको तुम,
क्या लिक्खूँ मैं तुमको,अब कुछ और प्रिये,
नीलकंठ तुम नीले रहियो, मेरी बात भगवान से कहियो,
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प्रेम सै दुनिया आय जो बस में,
फिर क्यों लोग लड़ैं आपस में,
आवौ फिर सै जा समझईयो,
मेरी बात...
खाय न पामैं रोटी कल सै,
हमैं निकारौ जा दल दल सै,
हम खुस रहैं, रहै खुस भईयौ,
मेरी बात...
चार दिना की जा जिनगानी,
सिगरी दुनिया आनी जानी,
कौन हमेसा के लये रईयौ,
मेरी बात...
रजनीकान्त शुक्ल