Tuesday, 7 February 2017

है आज नहीं कुछ हाथों में,
अपने भी नहीं तो ग़म क्यों हो, 

सूरज भी नहीं,चंदा भी नहीं,
तारे भी नहीं,जुगनू भी नहीं,
हम दूत उजाले के,किरनें बन,
अपनी डगर चमकाएंगे,


बादल भी नहीं,सागर भी नहीं,
नदिया भी नहीं,पोखर भी नहीं,
हम बूँद उम्मीद की,पत्तों पर,
मोती सा बिखरता जाएंगे,


तूफां भी नहीं,आंधी भी नहीं,
लूका भी नहीं,झोंका भी नहीं,
हम सांस की चलती डोरी हैं,
मंज़िल पे सफर ले जाएंगे,


है पास नहीं,कुछ परवा नहीं,
अपने भी नहीं तो क्यों ग़म हो,
हिम्मत से जो पत्थर जोड़े हैं,
हम उनसे राह बनाएंगे,

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