माँ तेरी वीणा के तारों की सुमधुर धुन,
सुनकर और गुनकर मैं जग को समझा पाऊँ,
सुनकर और गुनकर मैं जग को समझा पाऊँ,
बुद्धि दे हर स्वर के अंतर को पहचानूँ,
वीणा की पीड़ा को गीतों में गा पाऊँ,
वीणा की पीड़ा को गीतों में गा पाऊँ,
'सा'गर में छुपी हुई उन अशान्त लहरों को,
'रे'ती में गहरे जो दबे, ज्वलित ईंधन को,
'गा'फिल हैं जो कल से ऐसे अनजानों को,
'मा'सूमी के क़ातिल, रंघ्रहीन कानों को,
'पा'ञ्चजन्य का स्वर दूँ, ऐसी तू शक्ति दे,
'धा'रण करने में होऊँ समर्थ भक्ति दे,
'नी'रव इस संध्या के अंतर का कोलाहल,
'सा'नुरोध व्यक्त करूँ, नेह शक्ति पा जाऊँ,
'रे'ती में गहरे जो दबे, ज्वलित ईंधन को,
'गा'फिल हैं जो कल से ऐसे अनजानों को,
'मा'सूमी के क़ातिल, रंघ्रहीन कानों को,
'पा'ञ्चजन्य का स्वर दूँ, ऐसी तू शक्ति दे,
'धा'रण करने में होऊँ समर्थ भक्ति दे,
'नी'रव इस संध्या के अंतर का कोलाहल,
'सा'नुरोध व्यक्त करूँ, नेह शक्ति पा जाऊँ,
माँ तेरी वीणा के तारों की सुमधुर धुन,
सुनकर और गुनकर मैं जग को समझा पाऊँ,
सुनकर और गुनकर मैं जग को समझा पाऊँ,
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