जिसे दुश्मन समझता हूँ वही अपना निकलता है
हर इक पत्थर से मेरे सर का कुछ रिश्ता निकलता है
हर इक पत्थर से मेरे सर का कुछ रिश्ता निकलता है
डरा - धमका के तुम हमसे वफ़ा करने को कहते हो
कहीं तलवार से भी पांव का काँटा निकलता है
कहीं तलवार से भी पांव का काँटा निकलता है
ज़रा -सा झुटपुटा होते ही छुप जाता है सूरज भी
मगर एक चाँद है जो शब् में भी तनहा निकलता है
मगर एक चाँद है जो शब् में भी तनहा निकलता है
फ़ज़ा में घोल दी हैं नफरतें अहले सियासत ने
मगर पानी कुएँ से आज तक मीठा निकलता है
मगर पानी कुएँ से आज तक मीठा निकलता है
दुआएँ माँ की , पहुँचाने को मीलों मील जाती हैं
कि जब परदेश जाने के लिए बेटा निकलता है
कि जब परदेश जाने के लिए बेटा निकलता है
मुन्नवर राना
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