Tuesday, 7 February 2017

जिसे दुश्मन समझता हूँ वही अपना निकलता है
हर इक पत्थर से मेरे सर का कुछ रिश्ता निकलता है
डरा - धमका के तुम हमसे वफ़ा करने को कहते हो
कहीं तलवार से भी पांव का काँटा निकलता है
ज़रा -सा झुटपुटा होते ही छुप जाता है सूरज भी
मगर एक चाँद है जो शब् में भी तनहा निकलता है
फ़ज़ा में घोल दी हैं नफरतें अहले सियासत ने
मगर पानी कुएँ से आज तक मीठा निकलता है
दुआएँ माँ की , पहुँचाने को मीलों मील जाती हैं
कि जब परदेश जाने के लिए बेटा निकलता है
मुन्नवर राना

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