तुम्हारी नज़र क्यों खफ़ा हो गई,
खता बख्श दो ग़र खता हो गई,
हमारा इरादा तो कुछ भी न था,
तुम्हारी खता खुद सजा हो गई
खता बख्श दो ग़र खता हो गई,
हमारा इरादा तो कुछ भी न था,
तुम्हारी खता खुद सजा हो गई
सज़ा ही सही आज कुछ तो मिला है,
सज़ा में भी एक प्यार का सिलसिला है,
मोहब्बत का अब कुछ भी अंज़ाम हो,
मुलाकात की इब्दता हो गई,
सज़ा में भी एक प्यार का सिलसिला है,
मोहब्बत का अब कुछ भी अंज़ाम हो,
मुलाकात की इब्दता हो गई,
मुलाकात पर इतने मगरूर क्यों हो,
हमारी खुशामद पे मजबूर क्यों हो,
मनाने की आदत कहाँ पड़ गई,
सताने की तालीम क्या हो गई,
हमारी खुशामद पे मजबूर क्यों हो,
मनाने की आदत कहाँ पड़ गई,
सताने की तालीम क्या हो गई,
सताते न हम तो मनाते ही कैसे,
तुम्हें अपने नज़दीक लाते ही कैसे,
इसी दिन का चाहत को अरमान था,
कबूल आज दिल की दुआ हो गई,
तुम्हें अपने नज़दीक लाते ही कैसे,
इसी दिन का चाहत को अरमान था,
कबूल आज दिल की दुआ हो गई,
No comments:
Post a Comment