Tuesday, 7 February 2017

छब्बीस जनवरी
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साहिर ने यह नज़्म बरसोंबरस पहले लिखी थी। देखें उन्होंने जो प्रश्न उठाए थे क्या वे आज भी प्रासंगिक नहीं हैं?
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आओ कि आज गौर करें, इस सवाल पर,
देखे थे हमने जो, वो हसीं ख्वाब क्या हुए,
दौलत बढ़ी तो मुल्क में, इफ़्लास(दरिद्रता) क्यों बढ़ा,
खुशहालिए-अवाम के असबाब(संसाधन) क्या हुए,
जो अपने साथ-साथ चले कूए दार(फाँसी की कोठरी) तक,
वह दोस्त वह रफीक वो अहबाब(साथी)क्या हुए,
क्या मोल लग रहा है शहीदों के खून का,
मरते थे जिनपे हम वो सजायाब(दण्ड)क्या हुए,
बेकस बरहनगी (विवश नग्नता)को कफ़न तक नहीं नसीब,
वो वादा- हाए-अतलसो कमख्वाब(बहुमूल्य बस्त्रो के वादे)क्या हुए,
जमहूरियत नवाज़, बशर दोस्त, अम्न ख्वाह,
खुद को जो खुद दिए थे,वो अल्क़ाब (उपाधियाँ)क्या हुए,
मज़हब का रोग आज भी क्यों लाइलाज है,
वह नुस्खा हाए नादिरो-नायाब क्या हुए,
हर कूचा शोलाज़ार है,हर शहर कत्लगाह,
यकजहतिए-हयात के आदाब क्या हुए,
सहरा-ए-तीरगी(अंधे मरुस्थल) में भटकती है जिंदगी ,
उभरे थे जो उफ़क(क्षितिज)पे जो महताब(चाँद)क्या हुए,
मुजरिम हूँ अगर मैं तो गुनहगार तुम भी हो,
ऐ रहबरान-ए-कौम(देश के नेताओं) खताकार तुम भी हो,

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