Wednesday, 17 April 2013

कल तक चुप थे आज मगर हम, दिल की बात जरूर कहेंगे,


कल तक चुप थे आज मगर हम, दिल की बात जरूर कहेंगे,
तन को सुखी कर लें मन की पर, कैसे गरीबी दूर करेंगे,

मन का सुख ही सच्चा सुख है,सोचेंगे सब इन मसअ्लों पर,
नकली शक्ल दिखाने वाला,जब आईना चूर करेंगे,

पत्थर के संसार में, पत्थर दिल होंगे पर राम नहीं,
मन की आँखें खोल के कब ये, सच्चाई मन्जूर करेंगे,

हम ही तेरे सच्चे आशिक हैं,वक्त इसे दोहराएगा,
लिख लो आने वाले मुसाफिर, कल हमको मशहूर करेंगे,

सारे शहर की लगी निगाहें आज आपके ऊपर हैं,
कथनी और करनी का अंतर, कब तक दूर हुजूर करेंगे
,

खेत या कि सोना हो,प्यार हो या अंतर्मन,


खेत या कि सोना हो,प्यार हो या अंतर्मन, 
ये तभी निखरते हैं,जबकि पाएं जल यारो,

होंठ सूखते से हैं दिल का साज मद्धम है, 
वक्त माँगता दे दें एक नई ग़़ज़ल यारो,

तुम ही तो सुझाते हो रास्ते नए हमको, 
और तुम्हीं नहीं करते उनपे हो अमल यारो,

बन सकी इमारत ना नींव ही रख दें वरना, 
उँगलियाँ उठाए ना कोई हमपे कल यारो
,

कुछ देर की ही तस्कीन सही,कुछ देर का ही आराम सही,


कुछ देर की ही तस्कीन सही,कुछ देर का ही आराम सही,

इस अपनी खयाली दुनिया में,हमने कुछ ख्वाब सजाए थे, 
उम्मीद की बंजर धरती पर,कुछ राही मिलने आए थे, 

काली अधियारी रातों में,रौशन किरनें लहराई थीं, 
इस भोले मन को समझाने, आशा की परियाँ आईं थीं,

इस माया जाल अँधेरे में हो जातीं कुछ किरनें रौशन,
इतने सारे ग़म को खोकर,कुछ देर ही खुश हो लेते हम,

जो अपना हुआ इस दुनियाँ में,ख्वाबों का भी वो अंजाम सही
,

कितने दिल टूटे,बसे घर उजड़े दुनियाँ में,



कितने दिल टूटे,बसे घर उजड़े दुनियाँ में,
लहू के खेल में, शामिल रहीं हैं दीवारें,
चीन बर्लिन की हो,झूठे अहम या चाँदी की
हक़-ए-इंसाफ की, कातिल रहीं हैं दीवारें,
पीर हुई पर्वत सी,दर्द एक समन्दर सा,
आसमान जैसा दुख दे रही हैं दीवारें,

रंग नस्ल धर्मों में,जीवन के कर्मों में,
प्यार हुआ कम औ बड़ी हो रहीं है दीवारें,

खेतों घर आँगन में,तेरे मेरे मन में,
अब तो आसमाँ पे खड़़ी हो रही है दीवारें,

दर्द नहीं सुनती हैं,प्यार नहीं करतीं हैं,
सीने में रख पत्थर सो रहीं हैं दीवारें,

तेरा पता क्या पाऊँ,खुद भी लापता सा हूँ,
किस तरह का ये जादू कर रही हैं दीवारें,

उस तरफ उजाला है,इस तरफ अँधेरा है,
सबके मन में ये धोखा कर रही हैं दीवारें,

दरिया सा बहता था,खुश्बू बन प्यार यहाँ,
मन में अब सूनापन कर रही हैं दीवारें,

मैं ही हूँ दर्पन में देखते डर लगता है,
अब तो मुझमें खुद यारो कम नहीं हैं दीवारें,

बस्तियाँ बसाएँ यूँ,बंधन ना जिसमें हों,
रोशनी की राहों में हों न जहाँ दीवारें,