Wednesday, 17 April 2013

कितने दिल टूटे,बसे घर उजड़े दुनियाँ में,



कितने दिल टूटे,बसे घर उजड़े दुनियाँ में,
लहू के खेल में, शामिल रहीं हैं दीवारें,
चीन बर्लिन की हो,झूठे अहम या चाँदी की
हक़--इंसाफ की, कातिल रहीं हैं दीवारें,
पीर हुई पर्वत सी,दर्द एक समन्दर सा,
आसमान जैसा दुख दे रही हैं दीवारें,

रंग नस्ल धर्मों में,जीवन के कर्मों में,
प्यार हुआ कम बड़ी हो रहीं है दीवारें,

खेतों घर आँगन में,तेरे मेरे मन में,
अब तो आसमाँ पे खड़़ी हो रही है दीवारें,

दर्द नहीं सुनती हैं,प्यार नहीं करतीं हैं,
सीने में रख पत्थर सो रहीं हैं दीवारें,

तेरा पता क्या पाऊँ,खुद भी लापता सा हूँ,
किस तरह का ये जादू कर रही हैं दीवारें,

उस तरफ उजाला है,इस तरफ अँधेरा है,
सबके मन में ये धोखा कर रही हैं दीवारें,

दरिया सा बहता था,खुश्बू बन प्यार यहाँ,
मन में अब सूनापन कर रही हैं दीवारें,

मैं ही हूँ दर्पन में देखते डर लगता है,
अब तो मुझमें खुद यारो कम नहीं हैं दीवारें,

बस्तियाँ बसाएँ यूँ,बंधन ना जिसमें हों,
रोशनी की राहों में हों जहाँ दीवारें,


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