Sunday, 14 April 2013

अतिशय सहज लभ्य जो हमको..


अतिशय सहज लभ्य जो हमको,क्या दे सकते हैं आनन्द,
मन तो मतवाला उसका,जो सात द्वार के पीछे बन्द,
बिना श्रम किए सोचो तुमको प्राप्य अगर मिल जाएगा,
मंज़िल को मंज़िल कहने में,मानव फिर शरमाएगा,
एक जगह रुक सकती कब है,इस मन की जिज्ञासा,
शब्द असंभव की अब मानव भूल रहा परिभाषा,
समय उमर के साथ सभी के सपने होते हैं,
जिसमें कुछ नितान्त व्यक्तिगत अपने होते हैं,,
जिनमें अपने ही शासन की सृष्टि हुआ करती है,
लक्ष्य एक हों भिन्न जीवनी दृष्टि हुआ करती है,
यदि वह भिन्न नहीं तो पथ में नीरसता आएगी,
है संदिग्ध तुम्हें मंज़िल तक भी वो पहुँचाएगी,
मूल लक्ष्य रख एक राह चिन्तन से नई बनेगी, 
समय और स्थितियों में से होकर जो गुजरेगी,
होती चिंतन के दीपक की क्षीण कभी जब बाती,
तब-तब जीवन के विकास की धारा भी रुक जाती,
अनुभव से औरों के हमको दिशा भले मिलती हो,
संभव है विकास की कोई राह तुम्हें दिखती हो,
लेकिन मत भूलो अनुभव उसका अपना हासिल है,
भिन्न परिस्थिति समय और श्रम का उपजा फल है,
पता तुम्हें हर एक वक्त का अपना है अंदाज़,
कल का सच था होगा,हम देखेंगे क्या है आज,
जहाँ सर्जना नई हर एक पल ऐसा ये संसार,
(
बासी फूल करेंगे कैसे यौवन का श्रंगार,)


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