Tuesday, 30 April 2013

अब न रहा पहले सा गाँव,
ना ही अब रहीं हैं वे गली,
साथ अब हैं कम चलते पाँव,
हो जो विदा पालकी चली..


अब कहाँ हैं फागुनी वे गीत,
वह गोरी घट-पनघट प्रीत,
दुख-सुख की टेर सुने कौन,
दुबक गए शाम ज्यों ढ़ली..


आग पोर की, छिड़े वे किस्से,
अब हैं, गुजरे दिनों के हिस्से
चाचा का नेह
, राम-राम काका को,
बीते कल की बात हो चली.


गदराए आमों के बाग,
हर्षित मन वो आल्हा फाग,
खो गए अखाड़ों के जोड़,
रस्म हर पुरानी टली...


 वह बूढ़े बरगद की छाँव,
सुख देते थे ऐसे ठाँव,
दाँव-दाँव दन्ना के दाँव,

-की छाँव तक न ढ़ूँढ़ते मिली...
 

बेटी की शादी, बैल, बेटे की नौकरी,
भोज और मुकदमे में,खेत और आदमी,
टुकड़ा था टुकड़ों में बँट गया,
दर्द ने अभावों की मिरजई सिली...


रिश्ते अब सस्ते है धन से,
फासले हुए मन से मन के,
राहों ने आहों के जंगल में,
जिन्दगी ये किस कदर छली...


 जो साथ अब है कम चलते पाँव,
हो जो विदा पालकी चली,
अब न रहा पहले सा गाँव,
ना ही अब रही हैं वे गली,

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