Monday, 15 April 2013

यह सोच न लेना, कल को दूसरे पहनूँगा,


यह सोच लेना, कल को दूसरे पहनूँगा,
फैशन के तहत नहीं ओढ़े मैंनें विचार,
रग-रग में लहू मचलता आग उबलती है,
जब कभी सुनाई देती है शोषित पुकार,
ज्यों चुभे दंश अनुभूति सोने देती है,
चाँदनी रात में सौ- सौ ज्वार उठाती है,
तनहाई का ये जहर चाटता है मन को,
मत पूछ अकेलेपन की पीड़ा खाती है,
लेकिन मुझको अफसोस किंचित मात्र वरन,
आशा बेलों के बीच कली मुस्करा रही,
डर नहीं तुम्हें बन्दूक तोप तलवारों का,
छोड़े कहीं हम डरना,चिंता सता रही,
कितने सपने आँखों में ही खो गये, और,
कितने बलिदानों की ये याद दिलाती है,
सूखी कलम की स्याही है साक्षी इसकी,
कोई कुरबानी यूँ अकारथ जाती है,,
मैं सच कहता वह दिन आने ही वाला है,
धरती उगलेगी आग, गगन थर्रायेगा,
ये तन्त्र जो कि धोखा है,अपनों के खिलाफ,
इसके यन्त्रों का जाल होम हो जाएगा,
उस पुण्य यज्ञ में,मंथन से आहुति बनकर,
शोषण का ये साम्राज्य हवन हो जाएगा,
विद्वेष विषमता की,ज्वाला में जल-जल कर,
कंचन सा साम्य निखर कुन्दन हो जायेगा

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