Tuesday, 23 April 2013

हमने जिस काम को बचपन से दबाना चाहा,
मन में कूड़े की तरह ढ़ेर किया था जिसका,
जिक्र तक जिसका जुबाँ पर था एक गुनाह जैसा,
एक आवाज थी तूती की, जो सुनी न गई,

परत -दर- परत राख चढ़ती गई शोलों पर,
रेत में गहरे छिपे आग के लावे की तरह,
दब के पानी भी शिला तोड़ के बाहर आता
कैसे ये रोकतीं कमजोर दीवारें मन की,

बांध को तोड़ वो बह निकला है गलियो-गलियों,
कहीं पोस्टर कहीं पिक्चर तो कहीं गानों में,
मुँह से जो फूट रहा है किशोर बच्चों के,
आज अनजाने में कल जोर से यकीन के साथ आएगा,

आएगा फिर ये हवा और फिज़ा बदलेगी,
इससे भी ज्यादा कहीं वैसा वो आलम होगा,
प्रश्न वेताल सा फिर-फिर जवाब माँगेगा,
व्यूह में उत्तर के परेशान सा विक्रम होगा,

हश्र क्या होगा भला सोच के देखो तो जरा,
ग़र यूँ ही बढ़ता गया शोर किधर जाएगा,
हमने जो वक्त की आवाज को अनदेखा किया,
वक्त रक्खेगा हम पे पाँव गुजर जाएगा,...

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