Friday, 26 April 2013

खामोशी की खामोशी चुभन, सघन है चारो ओर उदासी,

खामोशी की खामोशी चुभन, सघन है चारो ओर उदासी,
तड़प रही हो विकल,राष्ट्र की आत्मा भूखी प्यासी,
चिंतक सर्जक अकुलाए कोलाहल में खोए हैं,
आज शहीदों के आँसू भी, बार- बार रोए हैं,
हिंसा बनी धर्म का साधन,मानवता सिर फोड़े,
स्वार्थी राजनीति है, प्रतिभा तड़प-तड़प दम तोड़े,
बीते दशक लदी है अबतक,ओढ़ी हुई गुलामी,
शासक बदले मगर, न मिल पाई सच्ची आजादी,
ऊपर उजले कपड़े पहने,अंदर दिल के काले,
खड़ी तमाशा देखे जनता,खुलते रोज घोटाले,
जहाँ ज्ञान ईमान जान की कीमत केवल पैसा,
गाँधी नेहरू के सपनों का,ये भारत है कैसा...


 वर्ग द्वेष से मुक्त, रहित शोषण से देश हमारा,
इंकलाब जन-जन के मन में,हो जीवित उजियारा,
झुकना सीखा नहीं, यही कहते थे वे अलबेले,
मातृभूमि हो मुक्त, कोई ये मेरा जीवन ले ले,
जेल और कालापानी, लाठी गोली ड़ंड़े भी,
कितनों ने हँस-हँस चूमे थे,फाँसी के फंदे भी,
आजादी की तड़प, दिलों में भरती थी अंगारे

कौन भला फिर ऐसे में, रह सकता था मन मारे,
नई पीढ़ियाँ करके देखें,वो अनुभव कैसा था,
भगतसिंह के सपनों वाला, वो भारत कैसा था,
आजादी के दीवानों का, वो भारत कैसा था...

 भिन्न समय श्रम और स्थिति के,अलग-अलग हल होते,
कालक्षेत्र में वीर सृजन के, नव सपने हैं बोते,
समय अभी भी है, सुन पाएं यदि सन्नाटे का स्वर,
अनुभव कर पाएं, मथते सागर के अंतर का ज्वर,
कल का हल था ठीक,गलत है आज, अगर तो छोड़े,
यही वक्त की माँग, विषमता की दीवारें तोड़े,
विघटन के स्वर की चिन्गारी, आग लगा सकती है,
हाँ, प्रबल राष्ट्र भावना, आज भी देश बचा सकती है,
यदि इज्ज़त की कीमत में, ये झूठा पैसा होगा,
तो सदियों के सपनों वाला, ये भारत कैसा होगा,
सोचें भारत कैसा होगा...

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