खेत या कि सोना हो,प्यार हो या अंतर्मन,
ये तभी निखरते हैं,जबकि पाएं जल यारो,
होंठ सूखते से हैं दिल का साज मद्धम है,
वक्त माँगता दे दें एक नई ग़़ज़ल यारो,
तुम ही तो सुझाते हो रास्ते नए हमको,
और तुम्हीं नहीं करते उनपे हो अमल यारो,
बन सकी इमारत ना नींव ही रख दें वरना,
उँगलियाँ उठाए ना कोई हमपे कल यारो,
ये तभी निखरते हैं,जबकि पाएं जल यारो,
होंठ सूखते से हैं दिल का साज मद्धम है,
वक्त माँगता दे दें एक नई ग़़ज़ल यारो,
तुम ही तो सुझाते हो रास्ते नए हमको,
और तुम्हीं नहीं करते उनपे हो अमल यारो,
बन सकी इमारत ना नींव ही रख दें वरना,
उँगलियाँ उठाए ना कोई हमपे कल यारो,
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