Sunday, 21 April 2013

भटक न जाना नई प्रगति के भारी शोर शराबों में,
प्रेम दया के फूल दबें ना, नफरत की मेहराबों में,
आबादी की बाढ़ बढ़ा, इंसां इंसा से दूर हुआ,
कानूनों को बढ़ा,जुर्म हर करने को मजबूर हुआ,
दिल में हल मौजूद प्रश्न का,ढ़ूँढ़े उसे बजारों में,

कुछ पाने की आस में हमको,कुछ खोना भी पड़ता है,
हँसने में है मज़ा तभी, जब कुछ रोना भी पडता है,
बिना सांस के आस न पलती,संस्कृति स्वांस हमारी है,
पथ की बाधाओं की खातिर, जो तलवार दुधारी है,
जो आनन्द मिले तूफाँ में,मिलता नहीं किनारों में,

वर्ष नहीं बीती हैं सदियां,हमने जो कुछ पाया है,
धरोहरें जो दिखा विश्व में,देश कभी इतराया है,
अपनी नासमझी में हमने,कल और आज गँवाया है,
वक्त ने अपने रण का डंका, अंतिम बार बजाया है,
आज खुला ऐलान किया है,बात न कही इशारों में,

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