Friday, 27 September 2013

हादसे ही हादसे हैं इन दिनों,
फासले दर फासले हैं इन दिनों,
बेवफा थे दोस्त कोई ग़म न था,
हमको खुद से ही गिले हैं इन दिनों,
लोग हमको न यूँ बुरा कहते,
आपके सुर में सुर मिला देते,
दो घड़ी के सुकून की खातिर,
रूह के ग़म अगर भुला देते,

जिनके बल पर मानवता, है जीवित अब भी,
जिनका इष्ट नहीं मन्दिर में, पीड़ित अब भी,
जिनका जीवन खुली हुई पावन गीता है,
जिनका जीवन पर दुख कातर विलगित अब भी,

ऐसे कर्मयोगियों का, सम्मान करे हम,
उनके ही आचरणों का अनुसरण करें हम,
जिसने मुझे सुकून दिलाया तमाम उम्र,
शायद वो था रक़ीब मेरा चारागर न था,

घटना रहा वजूद न अफसाना कि मुझमें,
खुद्दारियों का खून करे, वो हुनर न था,
अपने अन्दर जरा झाँक मेरे वतन,
अपने ऐबों को मत ढ़ाँक मेरे वतन,...

रंग औ नस्ल के दायरे से निकल,
गिर चुका है बहुत देर,अब तो सँभल,

तेरे दिल से जो नफरत न मिट पाएगी,
तेरे घर फिर गुलामी पलट आएगी,

अपनी बरबादियों का तुझे वास्ता,
ढ़ूँढ़ अपने लिए अब नया रास्ता,

अपने अन्दर जरा झाँक मेरे वतन,
अपने ऐबों को मत ढ़ाँक मेरे वतन,
प्यार गुनाह नहीं प्यार एक पूजा है,
जिसमें मंज़िल पता नहीं होती,
वो जवानी भी एक तोहमत है,
जिसमें कोई ख़ता नहीं होती,

सावन की फुहारें ठण्डी हों, या सर्द हवाओं का मौसम,
कोई तो कहे क्यों ऐसे में, जलता है बदन मालूम नहीं,

ठुकरा के जमाने की खुशियाँ,आए थे तेरी इस महफिल में,
नादान था दिल दुनियाँ की जिसे,रस्मों का चलन मालूम नहीँ,


कुछ ऐसी बहारें आईं हैं, बदली है फ़िजा इस गुलशन की,
दुनियाँ में खुशी छाई है पर, दिल को है वहम मालूम नहीं,


उम्मीद से भी आगे बढ़कर, कुछ ख्वाब सजाए बैठे हम,
भटके जो कदम टूटा जो भरम,होंगे कहाँ हम मालूम नहीं,

सूनी है नज़र रस्ता वीराँ, मंज़िल के पते का इल्म नहीं,
बढ़ते हैं कदम आगे-आगे, कैसी है लगन मालूम नहीं,