Wednesday, 27 November 2013

आई दिवाली,

(1)
आई दिवाली,
आई दिवाली,

दीपों की लड़ियाँ हँसीं,
खुशियों की घड़ियाँ हँसीं,

रोशनी बिखेर अपनी,
खिल-खिल फुलझड़ियाँ हँसीं,

हर घर हर चेहरे पर,
प्यारी सी मुस्कान लाई दिवाली,

आई दिवाली,
आई दिवाली,

चकरी लहरा नाची,
बकरी मिमिया नाची,

मुन्नी और चुन्नू संग,
झूम उठी माँ चाची,

डूबते अँधेरों में,
जगमगा उठे तन-मन,

भाई दिवाली,
आई दिवाली,

अँधियारा रोशन है,
गाता हरएक मन है,

हर घर हर गलियारे,
खुशियों का मौसम है,

रात अमावस काली,
रोशन हुई पल में,

छाई दिवाली
आईदिवाली,
 जीव और वन,

वन हैं धरती का श्रंगार,वन हैं कुदरत का उपहार,
वन के हैं उपयोग अपार, वन से उऋण न होंगे हम,
जीवन है ही जीव और वन,
वन से सीने में धड़कन, वन से गीतों में सरगम,
वन से खुशियों का मौसम,वन से जिन्दा हम और तुम,
जीवन है ही जीव और वन,

वन से दुनिया में हरियाली,वन से जीवन में खुशहाली,
वन से होली और दीवाली, वन जिन्दा तो जिन्दा हम,
जीवन है ही जीव और वन,

वन से है साँसों की डोर, वन से हैं खुशियाँ चंहु ओर,
वन है तभी नाचते मोर, वन से धरती पर सावन,
जीवन है ही जीव और वन,

वन से ही बनता वनराज,वन से तीतर हुदहुद बाज,
वन से बनें अनेकों साज,वन से औषधि और ईंधन,
जीवन है ही जीव और वन,

वन से चीते की रफ्तार,वन से हाथी की चिंघार,
वन के अनगिन उपहार,वन से कोयल की सरगम,
जीवन है ही जीव और वन,

वन से है उपयोगी फल,वन बादल से लेते जल,
वन से कविता गीत ग़ज़ल,वन जीवन का आकर्षन,
जीवन है ही

वन सेवा करते रह मौन,वन समान उपकारी कौन,
वन बिन सांस चलाता कौन,वन से मिलती आक्सीजन,
जीवन है ही जीव और वन,

आओ बादल, आओ बादल,
अब तो जल बरसाओ बादल,

चिप-चिप हुआ पसीने से तन,
लगता नहीं, कहीं भी ये मन,

धरती मांग रही है पानी,
इसकी चूनर फिर हो धानी,

जलता है हम सबका आँगन,
आकर अब बरसा दो सावन,

ताल-तलैया सब प्यासे है,
आने वाले चौमासे है,

जी भर-भर कर खूब नहाएं,
कागज़ की नावें तैराएं,

अब ना अधिक सताओ बादल,
अब तो जल बरसाओ बादल,

भइया करते हैं व्यायाम,

भइया करते हैं व्यायाम,

रोज सुबह वे जल्दी उठ कर,
नित्यक्रिया से निवृत होकर,
मंजन कर और मुँह को धोकर,
रोजाना कसरत करते हैं,
फिर करते हैं पूजा ध्यान,
भइया करते हैं व्यायाम,

सीना उनका काफी चौड़ा,
बड़ों-बड़ों का पंजा मोड़ा,
मुझसे कभी हुई जो गलती,
झट से कान पकड़ कर छोड़ा,
कहते है- आराम हराम,
भइया करते हैं व्यायाम,

प्रतिदिन ही वे पढ़ने जाते,
वापस आकर मुझे पढाते,
गन्दे बच्चे उन्हें न भाते,
मौसम के ताजे फल लाकर,
खाते खिलाते, सुबहो-शाम,
भइया करते हैं व्यायाम,
काश,जानवर बोल बोलते,
हम सबकी वे पोल खोलते,

कैसे उन्हें सताते हैं हम,
कितना उन्हें रुलाते हैं हम,

कौन क्रूर दिल अत्याचारी,
घोड़े कुत्ते गाय बेचारी,

आखिर को ये कौन बताए,
किसे जानवर बोला जाए,

दोनों की सच बात तोलते,
काश जानवर बोल बोलते,
अगर कहीं हम उड़ सकते जो,
चाँद- सितारे छू सकते तो,

कितना मज़ा हमें तब आता,
कोई नहीं हमको छू पाता,

उड़ते मस्ती भरे झूमते,
अपना प्यारा देश घूमते,

उड़ते जंगल, सागर, बगिया,
और देखते, सारी दुनिया,

दोस्त बनाते देश- देश के,
कुछ स्वदेश के,कुछ विदेश के,

संस्कृतियों से जुड़ सकते तो,
अगर कहीं हम उड़ सकते जो,
अगर आदमी को भी जो बच्चा होता,
सोचो प्यारे तब कितना अच्छा होता,

जनकर वह कहलाता सही जन्मदाता,
बच्चे दुख में कहते- ,मरे हाय पापा,

गृहस्थी के बंधन में ज्यादा बंध जाता,
तब इतना निश्चिंत न इंसां रह पाता,

होते कितने परिवर्तन सोच हँसी आती,
ये चौड़ा चकला सीना,बन जाता छाती,

कैसे देता ताने, अपनी घरवाली को,
रहता घर में फिर, बच्चों की रखवाली को,

लगन,समर्पण,स्नेह प्रेम सच्चा होता,
अगर आदमी के भी जो, बच्चा होता,