Sunday, 26 October 2014

अब की इस दीवाली में,
हम थे नोआखाली में,

बोतल से राकेट चलाए,
चर्खी घूमी थाली में,

खील खिलौने मिलके खाए,
घूमे सब खुशहाली में,

अच्छी बातें मन में रखीं,
गंदी बातें नाली में,

क्या-क्या हुआ बताया हमने,
अब की इस दीवाली में,

Tuesday, 30 September 2014

तोड़ कर घन हाथों से डोर,
चल पड़ी जब तू भू की ओर,
दृष्टि फैलाई चारों ओर,
नहीं था ओर न कोई छोर,

डोलती चली हवा के संग,
उड़ रही जैसे कोई पतंग,
मस्त हो मन नाचे इस ढ़ंग,
नाचता जैसे कोई मलंग,

न थी कुछ रस्ते की पहचान,
न था कुछ पाने का अरमान,
न था तुझको इन सबका ध्यान,
शून्य में विचर रहे थे प्रान,

साथ थी तुझ सी कई अनेक,
भरी थी पानी से हर एक,
खुशनुमा चेहरा मेरा देख,
हो के हैराँ यूँ बोली एक,

किसलिए खुश हो इतना आज,
पा लिया क्या जीवन का राज़,
घोल कानों में मधु आवाज़,
बना लो हमको भी हमराज़,

हँस के छेड़ी जो तूने तान,
सुन के मैं खुद अब तक हैरान,
कहा तेरा लूँ जो मैं मान,
'यही तो जीवन की पहचान',

(रजनीकान्त शुक्ल)
रचनाकाल --10-2-2006

Thursday, 25 September 2014

आसमान में ऊँची उड़ती, है प्यारी चिड़िया,
खूब हमारे मन को भाती, है प्यारी चिड़िया,

रंगबिरंगे पंखों वाले कपड़े यह पहने,
चौकन्नी हर पल है इसकी फुर्ती क्या कहने,

पास नहीं आती मन को, पर बहुत लुभाती है,
संग उड़ें हम इसके , ऐसा मन ललचाती है,

हम भी एक बनाएँगे अब , ऐसी ही चिड़िया,
सुन्दर पंख रंगेंगे जो होंगे , एकदम बढ़िया,

प्यारी नन्ही चिड़िया को, हम मित्र बनाएँगे,
मूर्ति बना कर रंगबिरंगे, चित्र बनाएँगे,

आजा री अब ना जा री तू ओ प्यारी चिड़िया,
मनभाता वो चीं-चीं गाना अब गा री चिड़िया,

Tuesday, 2 September 2014

घूम-घूम कर देख रहे हैं ,
मेले को बच्चे,

संग किताबों के ये,
लगते हैं कितने अच्छे,

दोस्त किताबें सबसे अच्छीं,
सभी बताते हैं,

अगर पढोगे तभी बढोगे,
सब समझाते हैं,

मानी बात बडों की,
आया मज़ा बड़ा हमको,

चेहरे देख बताओ,
कैसा लगता है तुमको,
खूब झमाझम बारिश आयी,मौसम हुआ सुहाना,
घर पर बैठ पकौड़े खाओ,आज कहीं मत जाना,

नहा रहीं पेड़ों की पत्ती, खूबसूरत लगती हैं,
टपक रही पत्तों से बूँदें, झरने सी झरतीं हैं,

छत के नीचे दुबके बैठे, घरवाले, पशु-पक्षी,
शरण यहाँ सबने ले रखी, बच्चे हों या बच्ची,

बारिश में निकलूँ,भीगूँ मैं ऐसा सोच रहा हूँ,
तन से थोड़ा लेकिन मन से पूरा भीग रहा हूँ,

बूँदें तन को सिहरातीं तो मन भी खुश हो जाता,
कभी सोचता आखिर हमने अपनाया क्यों छाता,

कदम रोक कहता मन मुझसे,दुनियादारी सीखूँ,
पागल मन बावरा सोचता, मैं बारिश में भीगूँ,

Sunday, 24 August 2014

उठ जाओ अब सुबह हुई ,
तुम आँखें तो खोलो,

चिड़ियाँ बोलीं मिसरी जैसी,
बोली तुम बोलो,

खुली हवा में टहलो घूमो,
मन क्यों सुस्त रहे,

थोड़ा योग करो, दोडो,तो,
तन भी चुस्त रहे,

सूरज निकले उससे पहले,
उठो नहा लोगे,

सारा दिन हँसते बीतेगा,
खुशियां पा लोगे,

अपना काम करो खुद सारा,
अच्छे बन जाओ,

प्यार करें सब तुमको,ऐसे,
बच्चे बन जाओ,

Sunday, 10 August 2014

लो ये दिन भी बीत गया,

यादोँ में रह जाने को,
कभी न वापस आने को,
लुटते हुए खजाने को,

भरा या हमने, रीत गया,
पर ये दिन भी बीत गया,

अपना या बेगाना था,
चमन या कि वीराना था,
सच्चा या अफसाना था,

जो भी रहा,व्यतीत गया,
हाँ,ये दिन भी बीत गया,

अब उसमें अपना क्या है,
समझो तो सपना सा है,
मन दे रहा दिलासा है,

दुश्मन था या मीत गया,
जो भी हो पर बीत गया,

था अपना पर भूत हुआ,
ज्यों गहरा हो एक कुँआ,
खेला हमने एक जुआ,

हार गया या जीत गया,
पर ये दिन भी बीत गया,

अब न कभी आएँ वो पल,
कल तो बस होता है कल,
बस उसका मिलता है फल,

खट्टा था या स्वीट गया,
हाँ ये दिन भी बीत गया,

पल प्रतिपल पय सम पी लें,
साँसों की सरगम सी लें,
जरा-जरा जीवन जी लें,

बीत गया सो बीत गया,
बीत गया सो बीत गया,

मेरे भइया मेरे चन्दा मेरे अनमोल रतन,
तेरे बदले में जमाने की कोई चीज न लूँ,

तेरी साँसों की कसम खा के हवा चलती है,
तेरे चेहरे की झलक पा के बहार आती है,

एक पल भी मेरी नज़रों से जो तू ओझल हो,
हर तरफ मेरी नज़र तुझको पुकार आती है,

मेरे भइया मेरे चन्दा मेरे....

तेरे चेहरे की महकती हुई लडियों के लिए,
अनगिनत फूल उम्मीदों के चुने हैं मैने,

वो भी दिन आये कि इन ख्वाबों को ताबीर मिले,
तेरी खातिर जो हसीं ख्वाब बुने हैं मैंने,

मेरे भइया मेरे चंदा मेरे अनमोल रतन,
तेरे बदले में जमाने की कोई चीज न लूँ,त

Sunday, 6 July 2014

कई दिनों के बाद है आया छुट्टी वाला दिन
कितना मेरे मन को भाया छुट्टी वाला दिन

आज नहीं उठना है जल्दी सोएँगे जी भर हम
ले जाओ क्या कर लेंगें ये चाय भला पीकर हम

हफ्ते भर जब खटे तो पाया  छुट्टी वाला दिन
कई दिनों के बाद है आया छुट्टी वाला दिन

क्यों टेँशन हो आज नहीं स्कूल हमें जाना
नही टोकना काम करेँगे हम तो मनमाना

कितनी सारी खुशियाँ लाया छुट्टी वाला दिन
कई दिनो के बाद है आया छुट्टी वीला दिन

जब भी हो रूटीन जिन्दगी सहा नहीं जाता
लगता एक मशीन जिन्दगी मजा नहीं आता

परिवर्तन ले करके आया छुट्टी वाला दिन
कई दिनो के बाद है आया छुट्टी वाला दिन

Thursday, 3 July 2014

प्रेम पथ पर चल पड़ा ये दिल सदा पागल रहा
हादसों की धूप में साया बना बादल रहा
जो मिला अब तक मिलेगा और भी वो इसलिये
मेरे अरमानों पे तेरे प्यार का आँचल रहा

खत्म हुई गर्मी की छुट्टी फिर स्कूल खुले
बहुत दिनों के बाद यार खुशियों के फूल खिले

खाली बैठे-बैठे अपना जी उकताया था
टी वी कम्प्यूटर गर्मी में रास न आया था

जी करता था वर्षा हो शाखोँ के पात धुले

होमवर्क भी खत्म हुआ नानी के घर फेरा
खरबूजा तरबूज आम का उखड़ गया डेरा

मन था किसे सुनाएँ किस्से साथी खूब मिले

फिर से भर नूतन उमंग में पढने जाएँगें
सीखेंगे समझेँगे अपना ज्ञान बढाएँगे

बिगडे काम बना करते आपस में हिले मिले

पढने लिखने से जीवन में अंतर आता है
सही गलत का भेद ये मन बेहतर कर पाता है

मिले हवा ये तभी कि जब पंखे की पवन डुले
खत्म हुई गर्मी की छुट्टी फिर स्कूल खुले

Wednesday, 2 April 2014

नन्ही लहर तेज लहरा कर, सागर हलचल से भर दे,
एक फूल खिल कर गुलशन का,जर्रा-जर्रा खुश कर दे,
दीप अँधेरे के सीने का पर्वत चीरे कहे यही,

नन्हा झरना बोले -मेरा हक़ है इसे इधर धर दे,

Wednesday, 26 February 2014

चला उसमे रवानी है, रूका पानी तो सड़ता है,
पराजित जिंदगी वाली, कहानी कौन पढ़ता है,

सफर में अनगिनत राही, अलग मंजिल अलग रस्ते,
कभी काँटे भी मिलते हैं, कभी फूलों के गुलदस्ते,
है अपना लक्ष्य क्या, इस वक्ष में उसको बसा ले तू,
जो धुन है जीत की,उस गीत को बस गुनगुना ले तू,

हो जिसमें आग बढ़ने की,वही तो आगे बढ़ता है,
पराजित जिंदगी वाली, कहानी कौन पढ़ता है,

जवानी नाम है सैलाब का,  तूफान का,  सुन लो,
निशानी लो समझ रस्ता,नए अभियान का चुन लो,
पुरानी बात सारी भूल जा, जो है अभी वो है,
नहीं कुछ मिल सकेगा,पास तेरे है अभी, वो है,

जो हिम्मत को बना सीढ़ी चढ़े, वो आगे चढ़ता है,
पराजित जिंदगी वाली, कहानी कौन पढ़ता है,

समय ये सोचने का है नहीं, कल इसको देखेंगे,
जमा हो जाएगा कूड़ा,तो फिर किस-किस को फेकेंगे,
ये दिन हैं आजममाइश के,जो करना है अभी कर लो,
ये दामन फूल काँटों से, जो भरना है, अभी भर लो,

ये हरदम याद रक्खो, जीतता वो ही,जो लड़ता है,
पराजित जिंदगी वाली, कहानी कौन पढ़ता है,




Friday, 21 February 2014

 मित्रो,( सुन्दर रात्रिगीत)

फैली हुई हैं सपनों की बाहें, आजा चल दें कहीं दूर,
वही मेरी मंज़िल वही तेरी राहें,आजा चल दें कहीं दूर,

ऊदी घटा के साए तले छिप जाएँ,धुँधली फिज़ा में,कुछ खोएँ,कुछ पाएँ-2
साँसों की लय पर,कोई ऐसी धुन गाएँ,दे दे जो दिल को दिल की पनाहें,
आजा चल दें कहीं दूर,
फैली हुई हैं सपनों की बाहें आजा चल दें कहीं दूर,
वही मेरी मंज़िल वही तेरी राहें,आजा चल दें कहीं दूर,

झूला धनक का ,धीरे-धीरे हम झूलें,अंबर तो क्या है तारों के भी लब छूलें,-2
मस्ती में झूमें,और कभी हम घूमें,देखें न पीछे मुड़के निगाहें,
आजा चल दें कहीं दूर,

फैली हुई हैं सपनों की बाहें, आजा चल दें कहीं दूर,
वही मेरी मंज़िल वही तेरी राहें,आजा चल दें कहीं दूर,
(साहिर)

Thursday, 6 February 2014






प्यार कर लिया तो क्या,प्यार है ख़ता नहीं,
तेरी मेरी उम्र में,  किसने ये किया नही,

तेरे होंठ मेरे होंठ मिल गए तो क्या हुआ,
दिल की तरह जिस्म भी खिल गए तो क्या हुआ,

इससे पहले ये सितम,क्या कभी हुआ नहीं,
प्यार कर लिया तो क्या,प्यार है ख़ता नहीं,

तू भी होशमन्द है,मैं भी होश मन्द हूँ,
उस तरह जिंएगे हम जिस तरह पसंद है,

उनकी बात क्या सुनें जिनसे वास्ता नहीं,
प्यार कर लिया तो क्या,प्यार है ख़ता नहीं,

रस्म क्या रिवाज़ क्या,धर्म क्या समाज क्या,?
दुश्मनों का खौफ क्यों,दोस्तों की लाज क्या ?

ये वो शौक़ है कि जिससे कोई भी बचा नहीं,
प्यार कर लिया तो क्या,प्यार है ख़ता नहीं,