Thursday, 3 November 2016

धमाके ही धमाके थे,
पटाखे ही पटाखे थे,
हुई जब शाम रौशन तो,
तिमिर के घर में फाके थे,
मनाई रात दीवाली,
नहीं था कोई अँधियारा,
दिए की लड़ियों के आगे,
अँधेरा डर गया, हारा,
अगर सब साथ मिल यूं ही,
भगाएंगे अँधेरों कोे,
न रोके रोका जा पाएगा,
आने से सवेरों को,

No comments: