Thursday, 3 November 2016

कभी कुछ बात कहना और कहना ... चलो रहने दो
कभी कुछ कहते कहते कह देना ... चलो रहने दो
ये अदाएं तुम्हारी ख़ास लगती हैं न जाने क्यूँ
कभी सोचा की कह डालूं,कभी सोचा ... चलो रहने दो
जताना भी नहीं आता कि ये तुमसे कैसा रिश्ता है
तुम्हारे साथ चलता मैं , फिर सोचा ... चलो रहने दो
मेरी बेक़रारी का आलम क्या है किसे जा कर बताऊँ मैं
था ये सोचा तुम को बताऊंगा , फिर सोचा...चलो रहने दो
ख्वाहिश है ये मेरी तुम्हे जी भर कर देखूं मैं
तुम्हारी तस्वीर बनाता मैं , फिर सोचा ... चलो रहने दो
जो तुम रूठ जाओगी तो ग़ज़ल कह कर मना लूँगा
ऐसे जो मानूं तो कहती हो , अच्छा ... चलो रहने दो
रहेगी उम्मीद जब तक ये हमारे एक होने की
डर है तुम कह न दो , उम्मीद को ... चलो रहने दो.

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