Saturday, 14 October 2017

भाव भरा हो,
नित नूतन स्वर,
लाएँ अर्थ
शब्द में भरकर,

कविता है
तो बोलेगी ही,
लोगों की
जुबान पर चढ़कर,
गुड्डी है तो
डोलेगी ही,
नीले आसमान
में बढ़कर,
चाँद हो सामने,
तारों की जरूरत क्या है,
तुम नज़र में हो,
नज़ारों की जरूरत क्या है,
यूँ तो दुनिया में,
बहुत से हैे मेरी राम सलाम,
दोस्त तुम सा हो,
हजारों की जरूरत क्या है,
फिर कहाँ मंज़िलों से दूरी है,
काम कुछ हो,ज़ुनू जरूरी है,
कुदरत हमें बचाती हरदम,
इसको हमें बचाना,
अपनी रग-रग में साँसों में,
इसका आना जाना,
हम इसके काम आएं न आएं,
पर इसको काम आना,
इसकी हर शय अपनी खातिर,
इक अनमोल खज़ाना,
पुरानी है हवेली पर चमक,
इसकी अनूठी है,
नगीना है ये गौरव देश का,
जैसे अगूंठी है,
अपना रावण मारें
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चुन्नू गया दशहरा मेला,
रावण फूँका गया वहाँ पर, 


चुन्नू कहे-बताओ पापा,
क्यों हर साल जलाते रावण, 


पापा बोले-चुन्नू तुमको,
क्यों ये बात समझ ना आई,

नाम सिर्फ पुतले का रावण,
खड़ी सामने यहाँ बुराई,

कहना है बस सबसे इतना,
अपने को हम आप सँवारें,

देख बुराई अपने अंदर,
हम अपने रावण को मारें,
आस का विश्वास का आया सवेरा,
जो करेगा दूर जीवन का अँधेरा,

इक नए उत्साह का सूरज उगा है,
चल पड़ेगा रथ बहुत दिन से रुका है,

क्षितिज के द्वारे से झुककर झाँकती किरनें,
रंग बिखराकर हमारा मन लगी हरने,

जाग जाएं जब तभी समझो सवेरा,
ग़म न कर ग़र राह में है तम घनेेरा,

चल रहा जीवन हमारा, चल रहे हम,
रुक गए ये कारवाँ सब, जाएगा थम,
चेहरों पे लगे चेहरे,
हमको ये बताते हैं,
हम दोस्त रहें मिलकर,
चेहरे खो जाते हैं,
दिल में तो एक जैसे,
अरमान मचलते हैं,
चेहरे तो झूठे हैं,
चेहरे तो बदलते हैं,
कहती हैं वीरान दिवारें मुझको भी पहचान,
आज दिख रही ऐसी,कल तक थी मेरी भी शान,
नज़र फेरकर यूँ मत जाओ, बैठो पास हमारे,
देखो कितना बड़ा खज़ाना अंदर मेरे छिपा रे,
कुदरत के कण-कण में सरगम,
नए सृजन का चाव,
सुनना चाहो, छोड़ जगत को,
कुछ पल यहाँ बिताओ,
रंग-रंगीले कपड़े पहने मैं जहाज रेगिस्तानी,
क्या-क्या मेरी विशेषताएँ क्या तुमने हैं वे जानी,
करें सवारी बैठें ऊपर कोई, राजा या रानी,
एक बार में पी लेता हूँ मैं हफ्ते भर का पानी,
प्रथम द्वितीय तृतीय पुरस्कृत हुए कहानीकारो,
जिम्मेदारी है तुम पर अब ज्यादा, यह स्वीकारो,
सरस सुगम स्वीकार्य कहानी की बहने दो सलिला,
देतीं शुभकामना खड़ी संग,भंडारी श्री विमला,
दूर-दूर तक पानी जिसमें,
कमल खिल रहे प्यारे,
बीच ताल जलमहल बना है,
यहाँ घूमने आ रे,
जगह सलूम्बर जिला उदयपुर-
का सेरिंग तालाब,
कैसा लगा देखकर तुमको,
कहिए जरा जनाब,
अधूरा निष्कर्ष
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एक छोटा सा बच्चा अपने दोनों हाथों में एक एक एप्पल लेकर खड़ा था.
उसके पापा ने मुस्कराते हुए कहा कि"बेटा एक एप्पल मुझे दे दो"
इतना सुनते ही उस बच्चे ने एक एप्पल को दांतो से कुतर लिया.
उसके पापा कुछ बोल पाते उसके पहले ही
उसने अपने दूसरे एप्पल को भी दांतों से कुतर लिया. अपने छोटे से बेटे की इस हरकत को देखकर बाप ठगा सा रह गया और
उसके चेहरे पर मुस्कान गायब हो गई थी....
तभी उसके बेटे ने अपने नन्हे हाथ आगे की ओर बढाते हुए पापा को कहा....
पापा ये लो ये वाला ज्यादा मीठा है...
शायद हम कभी कभी पूरी बात जाने बिना निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं.
नजर का आपरेशन तो सम्भव है,
पर नजरिये का नही..!!!
फर्क सिर्फ सोच का होता है......
वरना , वही सीढ़ियां ऊपर भी जाती है ,
और नीचे भी आती हैं ।
बहुत वीराना हूँ, फिर भी खड़ा हूँ,
कोई दीवाना हूँ, फिर भी खड़ा हूँ,
किसी का गीत ना कोई रुबाई,
महज भूला फसाना हूँ, फिर भी खड़ा हूँ,
कभी सरसब्ज़ छायादार था पर, फकत लूटा खज़ाना हूँ, फिर भी खड़ा हूँ,
हवा थी तेज, पानी भी नहीं था,
गुजर इसको भी जाना, फिर भी खड़ा हूँ,
नीलकण्ठ ट्रेकिंग अभियान
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यह पहला विश्राम ,
यहाँ से ऊपर चढ़ना होगा,
ऊँचे-नीचे राहों में,
संग-संग ही बढ़ना होगा,
हैं बन्दर लंगूर,
घास मत छूना,बिच्छू वाली,
जीव-जन्तु फल-फूल,
देखना मनमोहक हरियाली,
नीलकण्ठ ट्रेकिंग अभियान
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ले नीबू का पानी
या फिर चाय ले ले,
जरा धूप ले या
कहीं छाँव ले ले,
जो बारिश की बूँदें
पडें तेरे ऊपर,
लगा छाता पत्थर का,
आराम ले ले,
नीलकण्ठ ट्रेकिंग अभियान
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चेहरों पे खुशी छा जाती है,
आँखों में भी नूर आ जाता है,
कुदरत के करीब आ, तन मन में,
मस्ती का सुरूर आ जाता है,
एक से कोई दूसरा,
करता नहीं क्यों बातचीत,
एक सन्नाटा कि जैसे,
बिखरा हुआ महफिल में है,
वक्त आने दे बता देंगे,
ऐ अय जंगल तुझे ,
हम अभी से क्या बताएँ,
क्या हमारे दिल में है?
बहते हुए ये झरने,
मनमोहती हरियाली,
होली है ईद है ये,
ये दशहरा दीवाली,
खुश कर रहे ये मन को,
ग़म दूर भागते हैं,
पाते वे ऐसे लम्हे,
जिनके भाग्य जागते हैं,
नीलकण्ठ ट्रेकिंग अभियान
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जिन्दगी भी बह रही है,
ज्यों बहे झरना,
मौत आई तो मरेंगे,
आज क्यों मरना,
जो मिले पल उसमें जी लें,
हो के खुश कर दें,
चाँद से अमृत निचोडे़ं,
हाथ पर धर लें,
मेरे सपने इस झरने से हरदम रहते बहते,
सुनता हूँ आवाज़ें उनकी वे मुझसे ये कहते,
चले चलो अविराम इसी से खुशियां होंगी हासिल,
सोचो मत बस चले चलो पैरों लिपटेगी मंज़िल,
कहते हैं इसे पैसा बच्चों
ये चीज़ बड़ी मामूली है
लेकिन इस पैसे के पीछे
सब दुनिया रस्ता भूली हैं

इंसान की बनायी चीज़ है ये
लेकिन इंसान पे भारी हैं
हलकी सी झलक इस पैसे की
धर्म और ईमान पे भारी है
ये झूठ कों सच कर देता है
और सच कों झूठ बनाता है
भगवान नहीं पर हर घर में
भगवान की पदवी पाता है
इस पैसे के बदले दुनिया में
इंसानों की मेहनत बिकती है
जिस्मों की हरारत बिकती है
रूहों ही शराफत बिकती है
सरदार खरीदें जाते हैं
दिलदार खरीदें जाते हैं
मिट्टी के सही पर इस से ही
अवतार खरीदें जाते हैं
इस पैसे की खातिर दुनिया में
आबाद वतन बंट जाते हैं
धरती टुकड़े हो जाती है
लाशों के कफ़न बंट जाते हैं
इज्ज़त भी इस से मिलती है
ताजीम भी इस से मिलती है
तहज़ीब भी इस से आती हैं
तालीम भी इस से मिलती हैं
हम आज तुम्हे इस पैसे का
सारा इतिहास बताते हैं
कितने युग अब तक गुजरें हैं
उन सब की झलक दिखलातें हैं
इक ऐसा वक्त भी था जग में
जब इस पैसे का नाम न था
चीज़ें चीज़ों से तुलती थीं
चीज़ों का कुछ भी दाम न था
चीज़ों से चीज़ बदलने का
यह ढंग बहुत बेकार सा था
लाना भी कठिन था चीज़ों का
ले जाना भी दुश्वार सा था
इंसान ने तब मिलकर सोचा
क्यों वक्त इतना बर्बाद करें
हर चीज़ की जो कीमत ठहरे
वो चीज़ न क्यों इजाद करें
इस तरह हमारी दुनिया में
पहला पैसा तैयार हुआ
और इस पैसे की हसरत में
इंसान ज़लील ओ खार हुआ
पैसे वाले इस दुनिया में
जागीरों के मालिक बन बैठे
मजदूरों और किसानों की
तकदीरों के मालिक बन बैठे
जंगों में लड़ाया भूखों कों
और अपने सर पर ताज रखा
निर्धन कों दिया परलोक का सुख
अपने लिए जग का राज रखा
पंडित और मुल्ला इन के लिए
मज़हब के सहीफे लाते रहे
शायर तारीफें लिखते रहे
गायक दरबारी गाते रहे
ओ ओ ओ ओ
ओ ओ ओ ओ
वैसा ही करेंगे हम जैसा
तुझे चाहिए
पैसा हमें चाहिए
वैसा ही करेंगे हम जैसा
तुझे चाहिए
पैसा हमें चाहिए
हल तेरे जोतेंगे
खेत तेरे बोयेंगे
ढोर तेरे हाकेंगे
बोझ तेरा ढोएंगे
पैसा हमें चाहिए
पैसा
पैसा
वैसा ही करेंगे हम
जैसा तुझे चाहिए
पैसा हमें चाहिए
पैसा हाथ में दे दे राजा
गुण तेरे गायेंगे
तेरे बच्चे बच्चियों की
खैर मनाएंगे
पैसा हमें चाहिए
वैसा ही करेंगे हम
जैसा तुझे चाहिए
पैसा हमें चाहिए
युग युग से यूँ ही इस दुनिया में
हम दान के टुकड़े मांगते हैं
हल जोत के फसलें काट के भी
पकवान के टुकड़े मांगते हैं
लेकिन इन भीख के टुकड़ों से
कब भूख का संकट दूर हुआ
इंसान सदा दुःख झेलेगा
गर खत्म न ये दस्तूर हुआ
ज़ंजीर बनी है क़दमों की
वो चीज़ जो पहले गहना थी
भारत के सपूतों आज तुम्हे
बस इतनी बात ही कहना थी
जिस वक्त बड़े हो जाओ तुम
पैसे का राज मिटा देना
अपना और अपने जैसों का
युग युग का क़र्ज़ चुका देना
युग युग का क़र्ज़ चुका देना
साहिर


एक तरफ से
आओ आओ पी लो भाई ,
मटके का पानी,
स्वाद अलग है पीकर होगी ,
तुमको हैरानी,

फ्रिज का पानी, सादा पानी,
नलके का पानी,
बिना हाथ धोए मत पीना,
झलके नादानी,
आओ आओ पी लो भाई,
मटके का पानी,
नीलकण्ठ ट्रेकिंग अभियान
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उड़ने वालों उड़ो हवा में ,
ध्यान रहे इन बातों में,
फँस ना जाना कदम-कदम पर,
ऐसी बिछी बिसातों में,
नहीं साबका पड़े तुम्हारा,
आफत के परकालों से,
सारा जंगल भरा पड़ा है,
इन मकड़ी के जालों से,
ख़्वाब आँखों में, मैं पाँवों में सफ़र रखता हूँ
रेत पर लेट के तारों पे नज़र रखता हूँ

धूल हालात को हर बार चटाई मैंने
मैं मुक़द्दर तो नहीं रखता जिगर रखता हूँ

मेरी मंजि़ल को मेरी कितनी तलब है देखो
राह बन जाती है, मैं पांव जिधर रखता हूँ

चाँद तारों से उजालों से मुझे क्या लेना
मैं तो जुगनू हूँ अंधेरों की ख़बर रखता हूँ

हरमन दिनेश
खुशियाँ कहतीं हैं ?
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जीवन के पत्तों पर
बूँदों सी हम,
सोचो तो ज्यादा हैं
तोलो तो कम,
खुशियाँ इन बूँदों सी,
बरसे हर दम,
हम पर है ले पाएँ
ज्यादा या कम,
नीलकण्ठ ट्रेकिंग अभियान
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मौसम भी हुआ भीगा,
रुत पे भी जवानी है,
है आग कोई अन्दर,
बाहर से ये पानी है,
औरों की तो छोड़ो,
हैं पेड़ भी बौराए,
कुदरत की हर शय की
ये ही तो कहानी है,
नीलकण्ठ ट्रेकिंग अभियान
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नीलकण्ठ जो है अखण्ड,
ऊँची-नीची राह,
क्या वाह वाह,
सब एक रंग,
हों संग-संग,
हम क्या करेंगे,
बोलो क्या करेंगे,
मज़े करेंगे,मज़े करेंगे,मज़े करेंगे,
मज़े करेंगे,मज़े करेंगे,मज़े करेंगे,
नीलकण्ठ ट्रेकिंग अभियान
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ऊँचे नीचे रस्ते होइंगे,
चल-चल हालत खस्ते होइंगे,
भूलभुलैया हो जाएँगे,
भटके तो हम खो जाइंगे,
क्या करेंगे,
बोलो क्या करेंगे,
संग चलेंगे संग चलेंगे संग चलेंगे
संग चलेंगे संग चलेंगे संग चलेंगे,
पत्तों पर ठहरी-ठहरी
ये बारिश की बूँदें,
सोचें हम ये हैं
गालों पर आँखों को मूदें,
बंद करे पलकों को
पल-पल जीवन को जी लें,
मदिर-मदिर मन से साँसों की
मदिरा को पीलें,
क्या अच्छा है और बुरा
कहते किसको भूलें,
आज उम्मीदों के झूले चढ़
अम्बर को छू लें,
जीवन के रास्तों में
चलना है रुक के थम के,
खुशियों के फूल होंगे,
काँटे भी होंगे ग़म के,
आराम से दोनों से
हमको निबाह करना,
चलना उसूल पर ही,
जीना हो चाहे मरना,
खेल अब होने वाला है
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हल्ला गुल्ला शोर मचाएं,
आउट कर जल्दी भग जाएं,
जाएं तो पकड़े ना जाएं,
गया सामने बुना एक,
मकड़ी सा जाला है,
खेल अब होने वाला है,
छूकर भागें, साँस न टूटें,
एक साथ मिलकर सब छूटें,
जरा देर में यहाँ पे या कोई,
हँसने वाला है,
या कि फिर रोने वाला है,
खेल अब होने वाला है,