Wednesday, 24 July 2013

पूरी शिद्दत से मेरे दिल ने जिसे चाहा है,
कहीं वो मेरे खयालों का एक वहम तो नहीं,
मुद्दतों आँख में पले हुए, मीठे सपने,
मेरी तनहाई का पाला हुआ भरम तो नहीं,
तेरी शोखी वो शरारत और वो अंदाज़े-बयां,
मुझे तड़पाने का फितूर-ए-ज़ेहन तो नहीं,
ऐसन जो हमकौ सतैहौ,
तुम्हऊँ देखौ कल सै न रहियौ,-2

सासू है दुसमिन कौनौ जनम की,
ननदी हू पीर न जानी मन की,
आए बुलैइबे ना भइयौ,
तुम्हऊ देखौ कल सै न रहियौ,

खाए के बजरवा तू जा री चिरईया,
बैरी गए परदेस सँवरिया,
घूमै तोहे जो मिलैमोरे संइयाँ
गाए गाए के उनकौ सुनैयौ,
तुम्हऊ देखौ कल से न रहियौ,
चली जबसै तू मइके की राह गोरिया,
हमरे दुख्खन के खुलि गए किवार गोरिया,

हमरी इज्जत उतार के,तू मइके न जा,
दुख बाँट के रहैंगे, मन समझा न जा,
लोग बातैं बनैंहैं हजार गोरिया,
हमरे दुख्खन के खुलि गए किवार गोरिया,

जा गरीबी में हमपै दुख ऐसा पड़ा,
जैसे धोती फटी में हो प्यूँदा जड़ा,
का ओर से निबैहिहैं करार गोरिया,
हमरे दुख्खन के खुलि गए किवार गोरिया,

नाही खेती किसानी त मजूरी करूँ,
तेरे साथ बाल बच्चन का पेट भरूँ,
दुख अकिल्ले पड़ेगा पहार गोरिया,
हमरे दुख्खन के खुलि गए किवार गोरिया,


एक बूँद सावन की,
तन मन को सिहराती,
बढ़ा देती प्यास,जगा देती सोए अहसास,

मन की हर धड़कन का गा उठता तार,
जीवन की बगिया में महकती बहार,
जी चाहे भेजूँ मैं हवा से संदेश,
आ जाए प्रिय मेरा गया जो परदेश,
बढ़ जाती जीने की आस,

ठन्डी हवाएं तन में चुभती हैं तीर सी,
मन में जगाती हैं मीठी इक पीर सी,
बीता कल याद आए,बिरहा यूं तड़पाएं,
यादों में घडियां वे लगती शमशीर सी,
साँसों मे घुलती तेरे तन की सुवास,

एक बूँद सावन की,
तनमन को सिहाती,
बढ़ा देती प्यास,जगा देती सोए अहसास

नई पीढ़ी के प्रति
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हमारी आज की हर कामना,तुम पर निछावर है,
हमारी प्रार्थनाओं का पुकारा कल,तुम्हीं तो हो,

तुम्हारी दृष्टि से जुड़कर हमारी दृष्टि कहती है,
हमारी स्वप्नदर्शी आँख का काजल,तुम्हीं तो हो,

हमारी इन्द्रधनुषी कल्पनाओं में फलो-फूलो,
समय के श्याम-पट पर,ज्योति के अक्षर,सजाना तुम,

हमारे चोट खाए पाँव की, हर टीस कहती है ,
हमारी हर पराजय को विजय-गाथा,बनाना तुम,

-- शिवओम अम्बर
जब तक नंगे बदन बिहारी या गोपी मोहताज है,
तब तक कोई कैसे कह दे सचमुच हुआ सुराज है,
पर निराश होने की कोई बात नहीं है साथियो,
सदा नहीं रह सकती वैसी हालत जैसी आज है,

-- बलबीरसिंह रंग
यह भी कितना अजीब है,
कि उगाने वाले भूखे रहते है,
और अनाज पचा जाते है,
चूहे और बिस्तरों पर पड़े लोग,
बुनकर फटे चीथड़ों मे रहते हैं,
और अच्छे-अच्छे कपड़े पहनती हैं,
प्लास्टिक की मूर्तियाँ...(गोरख पाण्डे)