Sunday, 15 September 2013


आज प्रबल आवश्यकता है जन-जन के आह्वान की,
मन की लिप्सा लोभ त्यागने को जड़ता अभिमान की,
रह सके खामोश जुबाँ, जिन हालातों को देख कभी,
हमें बदलने हैं अपनी खोटी किस्मत के लेख सभी,

बढ़ो कि देखो तुमको खुद मंज़िल न आज पुकारा,
उठो जवानों आज वतन की माटी ने ललकारा,
हममें है क्या,जो हमें कोई हसीना चाहे,
सिर्फ जज़बात हैं जज़बात में क्या रक्खा है,

किसकी तक़दीर में हैं उनके महकते गेसू,
किसके घर फैलेगा उस मस्त नज़र का जादू,
इन परेशान सवालात में रक्खा है,

इतना दीवाना न बन अय दिले बेताब सँभल,
वो अगर मिल भी लिए तुझसे तो इतना न मचल,
बेतआल्लुक सी मुलाकात में क्या रक्खा है,

मुस्कराहट को मोहब्बत का इशारा न समझ,
मिल लिए होगे वो यूँ ही, उन्हें अपना न समझ,
ऐसे नादान खयालात में क्या रक्खा है,

(साहिर)

आज द्रोह की ही संस्कृति की हवा बह रही है हर ओर,
बुद्धिमान संत्रस्त दिख रहे राजा बने हुए है चोर,
काश कहीं से धुँआ उठे अंगार बने एक आग जले,
एक एक दो ग्यारह होकर मिलें राह में साथ चलें,

तिरछी भ्रकुटि आज मानवता की, कर रही इशारा,
उठो जवानों आज वतन की माटी ने ललकारा,
मौसम ने भीगे बालों से,
लहरा कर झटका जो पानी,
ये शाम जवाँ रंगीन हुई,
ये चली हवा क्या मस्तानी,
बरतरी के सुबूत की ख़ातिर,
खूँ बहाना ही क्या जरुरी है,
घर की तारीकियाँ मिटाने को,
घर जलाना ही क्या जरुरी है,

(साहिर)

उठो अहिंसा की संस्कृति पर हिंसा के आघात हो रहे,
स्वच्छ रुपहली इस धरती पर भीषण उल्कापात हो रहे,
कहीं न बदले मूल्य हमारे जीवन का प्रतिमान बने,
त्याग की गौरव गाथाएं बीते कल का इतिहास बनें,

प्रष्ठ न धूमिल हों, जिनको पूर्वज वीरों ने सँवारा,
उठो जवानों आज वतन की माटी ने ललकारा,
राजनीति की मंडी बड़ी नशीली है,
इस मंडी में सबने मदिरा पी ली है,
कमरबंद है पुख्ता सिर्फ दलालों के,
आम आदमी की तो धोती ढ़ीली है,

(रामेन्द्र त्रिपाठी)