आज प्रबल आवश्यकता है जन-जन के आह्वान की,
मन की लिप्सा लोभ त्यागने को जड़ता अभिमान की,
रह सके खामोश जुबाँ, जिन हालातों को देख कभी,
हमें बदलने हैं अपनी खोटी किस्मत के लेख सभी,
बढ़ो कि देखो तुमको खुद मंज़िल न आज पुकारा,
उठो जवानों आज वतन की माटी ने ललकारा,