Friday, 1 November 2013

मुड़-मुड़ के देखता रहा मैं राहगुजर को,
शायद कोई पयाम मिले मेरी नज़र को,

हसरत ही रही दिल को ऐ साथिया मेरे,
वक्ते-विदा भी तूने नहीं देखा इधर को,

मैं लूटा गया हूँ या खुद लुटा नहीं पता,
गुमसुम उदास दिख रहा दिल दुबका उधर को,

खुद्दारियों का खून करूँ पाऊँ ऐसी जीत,
दिल सीख नहीं पाया कभी ऐसे हुनर को,


हमको आए नहीं जीने के करीने यारो,
जानकर हमने डुबोए हैं सफीने यारो,

मयकशी अपने मुकद्दर में लिखी है तन्हा,
लोग उठ जाए तो हम जाएँगे पीने यारो,

ज़ु्ल्म पर ज़ुल्म सहे लब पे न लाए शिकवा,
ज़ब्त की दाद न दी हमको किसी ने यारो,

डूब जाऊँ कि लगूँ पार ये अपनी किस्मत,,
फिर पुकारा है हमें बहती नदी ने यारो,

आईने साफ करो अपने दिलों के पहले,
जाओ कैलाश कि फिर जाओ मदीने यारो,

हमको आए नहीं जीने के करीने यारो,
जानकर हमने डुबोए हैं सफीने यारो,

(रामेन्द्र त्रिपाठी)
भूल की मैंने तुम्हारी बात को जो प्यार समझा,
मृदु हँसी को ही तुम्हारी प्रीत का उपहार समझा,

ले तुम्हारी छवि ह्दय मंदिर सजाता ही रहा मैं,
भूल कर सब कुछ तुम्हारे गीत गाता ही रहा मैं,

रे निठुर तुमको ह्रदय ने प्रेम का अवतार समझा,
भूल की मैंने तुम्हारी बात को जो प्यार समझा,
मोहब्बत की नज़र जब मेहरबाँ मालूम होती है,
ये दुनियाँ खूबसूरत और जवाँ मालूम होती है,

तेरी तस्वीर आँखों में खिंची दिल में उतर आई,
कहाँ उभरी थी जालिम और कहाँ मालूम होती है,

ये कैसी आग भड़का दी है तूने मेरे सीने में,
कि अब जो साँस आती है,धुँआ मालूम होती है,

ये मस्ताना ग़ज़ल छेड़ी है,जो साक़ी ने महफिल में,
किसी मयकश के दिल की दास्ताँ मालूम होती है,

(साहिर)

जो हो एक बार वो हर बार हो, ऐसा नहीं होता,
हमेशा एक ही से प्यार हो, ऐसा नहीं होता,

सिखा देती हैं चलना, ठोकरें भी राहगीरों को,
कोई रस्ता सदा दुश्वार हो, ऐसा नहीं होता,

हर एक कश्ती का अपना तजुर्बा होता है, दरिया में,
सफर में रोज ही मँझधार हो, ऐसा नहीं होता,

कहीँ तो कोई होगा जिसको, अपनी भी जरूरत हो,
हर एक बाजी में दिल की हार हो, ऐसा नहीं होता,
किस तरह भयावह दिखता है,सन्नाटा ये कोलाहल का,
परदे के पीछे परदा है ,बोझल सा स्वारथ का,छल का,

हर नज़र भटकटी फिरती है,हर लहर किनारा माँग रही,
विभ्रम में गुमी जवानी भी, अब एक सहारा माँग रही.

अब बात सुनो आँखें खोलो,ये वक्त तुम्हें कुछ कहता है,
सीने में शान्त उदधि के ही बड़वानल सोया रहता है,

दिन नहीं अभी बीते ज्यादह, देखा था जो प्यारा सपना,
जिसकी खातिर वे कष्ट सहे,कुर्बान किया सब कुछ अपना,

पर आह हुआ छल वृक्ष आम्र पर, ये बबूल के काँटे हैं,
कुछ नहीं किया,सुख नहीं दिया पुण्यात्मा को दुख बाँटे हैं.

है वह विचार धूमिल लगता,तस्वीर का रंग भी फीका है,
दे रक्त इसे सींचो, बाक़ी जो कर्ज बड़ा धरती का है,

अब कदम बढ़ा आगे आओ,ये लगी दृष्टि मंज़िल पर है,
जल रहा आज जो धू-धू कर वह नहीं ग़ैर अपना घर है,

चुका बहुत अब नहीं मात्र सरकार बदलना बाकी है,
शोषण अन्याय गरीबी का आधार बदलना साथी है,

हुलसाता अंतर,जो विचार वह प्रान गहन उस रव का है,

ये पान प्रेम आसव का है, ये गान महा विप्लव का है,