Friday, 1 November 2013

मोहब्बत की नज़र जब मेहरबाँ मालूम होती है,
ये दुनियाँ खूबसूरत और जवाँ मालूम होती है,

तेरी तस्वीर आँखों में खिंची दिल में उतर आई,
कहाँ उभरी थी जालिम और कहाँ मालूम होती है,

ये कैसी आग भड़का दी है तूने मेरे सीने में,
कि अब जो साँस आती है,धुँआ मालूम होती है,

ये मस्ताना ग़ज़ल छेड़ी है,जो साक़ी ने महफिल में,
किसी मयकश के दिल की दास्ताँ मालूम होती है,

(साहिर)

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