Tuesday, 26 November 2013

खून अपना हो या पराया हो,नस्ले आदम का खून है आखिर,
जंग मशरिक में हो या मगरिब में अम्ने-आलम का खून है आखिर,

बम घरों पर गिरें कि सरहद पर, रुहे-तामीर जख़्म खाती है,
खेत अपने जलें कि औरों के, ज़ीस्त फाक़ों से तिलमिलाती है,

टैंक आगे बढ़ें या पीछे हटें, कोख धरती की बाँझ होती है,
फतह का जश्न हो,या हार का सोग,जिन्दगी मैय्यतों पे रोती है,

जंग तो खुद ही एक मसला है,जंग क्या मसअलों का हल होगी,
आग और खून आज बख्शेगी,भूख और एहतियाज कल देगी,

इसलिए अय शरीफ इंसानो,जंग टलती रहे तो बेहतर है,
आप और हम सभी के आँगन में, शम्मा जलती रहे तो बेहतर है,

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