Tuesday, 26 November 2013


एक दिन बैठी मैं अपने बागीचे,
खेल रही थी एक पेड़ के नीचे,

देखा चली आ रही एक परी थी,
अपनी दोनों ही आँखों को मींचे,

आँखें नीली, उसके बाल सुनहले,
चम-चम चमकें उसके वस्त्र रुपहले,

हाथ छड़ी उसके थी जादू वाली,
फूल झरे,सामने नज़र जो डाली,

बोली मुझसे, मेरे संग चलोगी,
परीलोक की बोलो सैर करोगी,

मैं भी थी तैयार, उड़ चले ऊपर,
बादल और पवन दोनों में घुसकर,

पहुँचे,घूमे,मौज मनाई ,आए,
आँख खुली तो मम्मी मुझे जगाए,

उठो चलो स्कूल बैग लो अपना,
टूट गया, मैंने देखा था सपना,

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