वक्त से दिन और रात ,वक्त से कल और आज,
वक्त की हर शै गुलाम,वक्त का हर शै पे राज,
वक्त की पाबंद हैं आती जाती रौनकें,
वक्त है फूलों की सेज,वक्त है काँटों का ताज,
वक्त के आगे उड़ी, कितनी तहज़ीबों की धूल,
वक्त के आगे मिटे,कितने मज़हब और रिवाज़,
वक्त को गरदिश से है, चॉंद तारों का निज़ाम
वक्त की ठोकर में हैं, क्या हकूमत क्या समाज,
आदमी को चाहिए वक्त से डर कर रहे
कौन जाने किस घड़ी,वक्त का बदले मिज़ाज,
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