Sunday, 17 November 2013



हर वक्त तेरे हुश्न का होता है समां और,
हर वक्त मुझे चाहिए अन्दाज़े-बयां और,

फूलों सा कभी नर्म तो शोलों सा कभी गर्म,
मस्ताना अदा में,कभी शोखी है कभी शर्म,

हर सुबह गुमां और है, हर रात गुमां और,
हर वक्त तेरे हुश्न का होता है समां और,

भरने नहीं पातीं तेरे जल्बों से निगाहें,
थकने नहीं पातीं तुझे लिपटा के ये बाँहें,

छू लेने से होता है तेरा जिस्म जबां और,
हर वक्त तेरे हुश्न का होता है समां और,

(साहिर)

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